Monday, October 12, 2026

Parcel मिला, ₹1,719 Paytm भी कर दिए… फिर Delhivery का “Delivery Cancelled” message क्यों आया?

 


COD Delivery के नाम पर मेरे साथ हुई एक हैरान करने वाली घटना | Dev Vaidik

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…

नमस्कार दोस्तों! 🙏

पिछले कुछ दिनों से online shopping और courier delivery को लेकर मेरे साथ कुछ ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, जिन्हें देखकर अब मन में एक ही सवाल उठता है—

क्या अब online shopping में parcel मँगाने के बाद उसे सही-सलामत प्राप्त करना भी एक चुनौती बनता जा रहा है?

अभी कुछ दिन पहले Amazon के return pickup को लेकर मेरे साथ एक अजीब घटना हुई थी। उसकी कहानी मैंने अपने पिछले ब्लॉग में साझा की थी।

और आज, 12 अक्टूबर 2026 को, एक बार फिर मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।

इस बार मामला Amazon का नहीं, बल्कि Delhivery courier से जुड़ी COD delivery का है।

इस घटना में parcel भी था, ₹1,719 का online payment भी था, दो युवक भी थे और सबसे हैरान करने वाली बात—parcel हाथ में मिलने के बाद मेरे मोबाइल पर delivery cancellation का message भी आ गया!

अब आप ही सोचिए…

जब parcel ग्राहक को दे दिया गया, उसका पैसा भी ले लिया गया, तो फिर उसे cancel करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?

आइए, पूरी कहानी शुरू से बताता हूँ।


1. Courier वालों के चक्कर पहले भी काट चुका हूँ

कुछ समय से मेरे parcels की delivery को लेकर परेशानी हो रही थी।

पिछले तीन-चार मौकों पर ऐसा हुआ कि Delhivery की तरफ से मेरे parcel को non-deliverable mark कर दिया गया। मुझे अपना parcel लेने के लिए उनके local office तक जाना पड़ा।

अब आप समझ सकते हैं कि office में काम करने वाले व्यक्ति के लिए बार-बार courier office जाना कितना असुविधाजनक है।

Parcel online order करो, delivery का इंतजार करो और अंत में खुद जाकर सामान लेकर आओ!

खैर, मैंने इसे सामान्य delivery परेशानी समझकर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

लेकिन इस बार मैंने सोचा कि चलिए, parcel के लिए अलग से भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी।

मुझे क्या पता था कि इस बार कहानी कुछ अलग ही होने वाली है।

2. सुबह एक personal number से फोन आया

आज सुबह मुझे एक personal mobile number से call आया।

दूसरी तरफ मौजूद व्यक्ति ने मेरी location के बारे में पूछा।

मैंने उसे अपने office की location बताई और WhatsApp पर GPS location भी share कर दी, ताकि उसे address खोजने में परेशानी न हो।

इसके बाद मैं अपने काम में लग गया।

मुझे उम्मीद थी कि courier agent आएगा, parcel देगा, मैं COD payment करूँगा और अपना काम आगे बढ़ाऊँगा।

एक सामान्य customer इससे ज्यादा क्या उम्मीद करेगा?

लेकिन समय बीतता गया।

करीब 3 बजे तक मैं parcel का इंतजार करता रहा।

फिर call आया कि delivery के लिए नीचे आ जाइए।

मैं अपने office से नीचे पहुँचा।

वहाँ दो युवक एक sports bike पर मौजूद थे। उनमें से एक delivery कर रहा था और दूसरा पीछे बैठा हुआ था।

मैंने parcel देखा और सोचा कि चलिए, आखिरकार delivery हो गई।

लेकिन असली कहानी तो अभी बाकी थी।

3. ₹1,719 का payment… और पहली गड़बड़ी यहीं हुई

₹1,719 का COD payment Paytm से successful हुआ।

यह COD यानी Cash on Delivery वाला order था।

Delivery करने वाले युवक ने पूछा कि payment online करेंगे या offline?

मैंने कहा कि online कर देता हूँ।

उसने payment का तरीका बताया और मैंने अपने Paytm से ₹1,719 का भुगतान कर दिया।

मेरे मोबाइल पर payment successful दिखाई दिया।

सब कुछ सामान्य लग रहा था।

लेकिन बाद में जब मैंने transaction details ध्यान से देखीं, तो एक बात ने मेरा ध्यान खींचा।

पैसा किसी महिला के नाम से दिखाई देने वाले UPI खाते में गया था।

यह वही सवाल है जिसने पूरी घटना को संदिग्ध बना दिया।

मेरा order COD था। मैं parcel लेने आया था। मेरे सामने delivery करने वाला व्यक्ति खड़ा था।

ऐसी स्थिति में मेरे लिए स्वाभाविक था कि मैं समझूँ कि payment delivery की प्रक्रिया का हिस्सा है।

लेकिन क्या उस UPI खाते का Delhivery या seller की अधिकृत collection प्रक्रिया से संबंध था?

क्या वह अधिकृत payment account था?

या payment किसी ऐसे खाते में जा रहा था जिसका इस delivery से कोई अधिकृत संबंध नहीं था?

मैं उस समय इन बातों से अनजान था।

मेरे सामने payment successful होने का message था, इसलिए मैंने मान लिया कि मेरा काम पूरा हो गया है।

बाद में मुझे यह जाँचने की जरूरत महसूस हुई कि पैसा आखिर किसके खाते में और किस अधिकृत व्यवस्था के तहत गया।

4. फिर शुरू हुआ OTP का खेल

Parcel प्राप्त करने और payment करने के बाद delivery cancellation से जुड़ा message आने पर मैंने सवाल उठाया।

Payment करने के बाद delivery करने वाले युवक ने मुझसे delivery code माँगा।

उसने कहा कि message notification देखकर code बता दीजिए।

मैंने अपने मोबाइल में messages चेक किए।

लेकिन उस समय मुझे delivery confirmation वाला code दिखाई नहीं दिया।

मैंने कहा कि message अभी नहीं आया है।

कुछ देर बाद पीछे बैठे दूसरे युवक ने पहले वाले से कहा कि code दोबारा भेज दो।

यह बात मेरे लिए थोड़ी अजीब थी, लेकिन उस समय मैंने इसे delivery की सामान्य प्रक्रिया समझा।

इसके बाद दूसरे युवक ने मदद करने की पेशकश भी की। उसने मेरा फोन अपने हाथ में लेकर code देखने में मदद करने की कोशिश की।

लेकिन मैंने message आने का इंतजार किया।

और यहीं वह छोटी-सी सावधानी काम आ गई।

कुछ समय बाद मेरे मोबाइल पर Delhivery के नाम से एक message आया।

मैंने message का content पढ़ा।

उसमें delivery confirm करने की बात नहीं थी।

उस message में delivery को permanently CANCEL करने के लिए OTP देने की बात लिखी थी!

एक बार फिर पढ़िए।

मैं parcel लेने के लिए नीचे आया था।

Parcel मुझे दिया जा चुका था।

मैं ₹1,719 का payment कर चुका था।

और अब message में delivery cancel करने के लिए OTP माँगा जा रहा था!

मेरे लिए यह किसी बड़े सवाल से कम नहीं था।

मैंने युवक को बताया कि मुझे cancellation से संबंधित message आया है, जबकि parcel तो मुझे मिल चुका है और payment भी हो चुका है।

5. “सर, गलती हो गई… आपका नाम किसी दूसरे customer से मिलता है!”

मेरी बात सुनकर delivery करने वाला युवक मुस्कुराया।

उसने कहा कि शायद गलती हो गई है। आपका नाम किसी दूसरे customer से मिलता है, इसलिए ऐसा हो गया होगा।

उसने बात को सामान्य बताने की कोशिश की।

लेकिन मेरे मन में सवाल थे।

अगर किसी दूसरे customer के नाम से भ्रम हुआ था, तो मेरे parcel पर आए payment और cancellation message का आपस में क्या संबंध था?

अगर parcel सही customer को दे दिया गया था, तो delivery cancel करने वाला message क्यों आया?

और अगर payment अधिकृत तरीके से लिया गया था, तो उसका transaction record किस delivery के साथ जुड़ा था?

मैं इन सवालों का जवाब माँग पाता, उससे पहले ही दोनों युवक अपनी bike पर बैठकर वहाँ से निकल गए।

उस समय मुझे पूरी घटना की गंभीरता का अंदाजा नहीं था।

लेकिन बाद में जब मैंने Paytm transaction और message screenshots को एक साथ देखा, तो मेरे मन में शक और गहरा हो गया।

6. आखिर उन दोनों युवकों का इरादा क्या था?

अब आते हैं इस घटना के सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर।

क्या यह केवल system error था, या payment collection और delivery cancellation की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी की गई थी?

इसका पक्का जवाब फिलहाल मेरे पास नहीं है।

और मैं बिना जाँच के किसी व्यक्ति या पूरी courier company को दोषी नहीं ठहराना चाहता।

लेकिन कुछ संभावनाएँ हैं, जिनकी जाँच जरूरी है।

संभावना नंबर 1: COD payment को किसी अनधिकृत खाते में लेना

अगर delivery agent को COD payment अपने अधिकृत collection system के जरिए लेना था, लेकिन पैसा किसी ऐसे व्यक्तिगत UPI खाते में गया जिसका कंपनी की collection प्रक्रिया से संबंध नहीं था, तो यह गंभीर मामला है।

इससे यह सवाल उठता है कि payment किसने प्राप्त किया, उसे किसके खाते में दर्ज किया जाना था और क्या seller को उसका credit मिलेगा?

केवल UPI खाते पर किसी महिला का नाम दिखाई देना यह साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति इस घटना में शामिल था। यह भी जाँचना जरूरी है कि उस खाते का वास्तविक उपयोग किसने किया और क्या वह अधिकृत था।

संभावना नंबर 2: Parcel देने के बाद भी cancellation या return status बनाना

यह दूसरी महत्वपूर्ण संभावना है।

अगर parcel customer को दे दिया गया हो, payment भी प्राप्त हो गया हो, लेकिन system में order को cancelled या return-to-sender दिखाया जाए, तो delivery की वास्तविक स्थिति और system records के बीच अंतर पैदा हो सकता है।

इस स्थिति में सवाल उठता है कि parcel के बदले प्राप्त रकम किसके पास रहेगी और seller तथा courier के records में क्या दर्ज होगा?

क्या इस घटना में ऐसा कुछ हुआ?

इसका जवाब Delhivery और संबंधित seller के records की जाँच के बाद ही मिल सकता है।

संभावना नंबर 3: OTP के जरिए cancellation को पूरा करवाने की कोशिश

मेरे मोबाइल पर जो message आया, उसमें delivery को permanently cancel करने के लिए OTP माँगा गया था।

इसलिए मेरे मन में यह संदेह पैदा हुआ कि क्या मुझसे ऐसा code हासिल करने की कोशिश की जा रही थी, जिससे cancellation की प्रक्रिया पूरी की जा सके।

मैंने message का content पढ़ा और समझ लिया कि code किस काम के लिए माँगा जा रहा था।

मैंने उसे delivery confirmation का code मानकर साझा नहीं किया।

लेकिन यह पता लगाना जरूरी है कि cancellation message किसने trigger किया था और किस system action के कारण delivery cancel होने की स्थिति बनी।

संभावना नंबर 4: वास्तविक system या operational error

यह भी संभव है कि गलत order, गलत status या किसी operational error के कारण यह confusion पैदा हुआ हो।

इसीलिए निष्कर्ष निकालने से पहले delivery logs, payment collection records, OTP request और संबंधित कर्मचारियों की जानकारी की जाँच जरूरी है।

मेरे लिए सबसे बड़ा सवाल किसी की नीयत का अनुमान लगाना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि payment और cancellation message के बीच संबंध क्या था।

क्योंकि अगर यह system error है तो उसे ठीक होना चाहिए।

और अगर किसी ने जानबूझकर प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है, तो उसकी पहचान करके उचित कार्रवाई होनी चाहिए।

7. मैंने आखिर क्या सीखा?

आज की घटना ने मुझे कुछ बहुत जरूरी बातें सिखाईं।

पहली बात—केवल parcel हाथ में मिल जाने का मतलब यह नहीं है कि delivery प्रक्रिया में सब कुछ सही दर्ज हो गया है।

दूसरी बात—COD payment करते समय यह देखना जरूरी है कि भुगतान किस merchant या अधिकृत payment व्यवस्था में जा रहा है।

तीसरी बात—हर OTP एक जैसा नहीं होता।

अगर message में delivery cancel करने की बात लिखी है, तो उसे delivery confirmation का code समझकर किसी को नहीं बताना चाहिए।

और चौथी बात—

किसी अनजान व्यक्ति को अपना फोन हाथ में देने से बचना चाहिए, विशेष रूप से तब जब वह OTP या payment के नाम पर जल्दबाजी कर रहा हो।

आपको शक हो, तो वहीं रुकिए। Official tracking application या customer support से पुष्टि कीजिए।

कुछ मिनट अतिरिक्त लग जाएँगे, लेकिन आपके पैसे और आपकी जानकारी सुरक्षित रह सकती है।

8. Delhivery से मेरे कुछ सीधे सवाल

मैं यह ब्लॉग किसी कंपनी को बदनाम करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ।

मैं चाहता हूँ कि इस घटना की जाँच हो और स्थिति स्पष्ट हो।

इसलिए मेरे सवाल सीधे हैं:

1. मेरे COD order का ₹1,719 payment जिस UPI खाते में गया, क्या वह Delhivery या seller की अधिकृत payment collection व्यवस्था का हिस्सा था?

2. Parcel सौंपे जाने के बाद delivery permanently cancel करने वाला OTP message क्यों आया?

3. मेरे द्वारा cancellation न करने की जानकारी देने के बावजूद delivery cancelled का message क्यों आया?

4. क्या system में यह दर्ज हुआ कि parcel वास्तव में customer को सौंपा गया था?

5. क्या संबंधित delivery agent, payment transaction और cancellation request की जाँच की जा सकती है?

इन सवालों का जवाब केवल अनुमान से नहीं मिल सकता।

इसके लिए संबंधित records और transaction trail की जाँच आवश्यक है।

मुझे उम्मीद है कि Delhivery और संबंधित seller इस शिकायत को गंभीरता से लेंगे और स्पष्ट जवाब देंगे।

9. मेरे सभी online shopping करने वाले दोस्तों के लिए एक सलाह

आजकल online shopping हमारी जरूरत बन चुकी है।

हम कपड़े, जूते, perfume, electronics और न जाने क्या-क्या घर बैठे मँगाते हैं।

COD को हम अक्सर आसान और सुविधाजनक विकल्प मानते हैं।

लेकिन इस सुविधा के साथ थोड़ी सावधानी भी जरूरी है।

  • Parcel प्राप्त करने से पहले order और tracking details की पुष्टि करें।

  • COD payment केवल अधिकृत payment method या verified collection process के जरिए करें।

  • किसी निजी UPI खाते में payment माँगा जाए तो पहले courier company या seller से पुष्टि करें।

  • OTP का message पूरा पढ़ें। उसमें cancellation, refund या किसी अन्य कार्रवाई का उल्लेख हो तो बिना समझे code साझा न करें।

  • किसी अनजान व्यक्ति को अपना फोन unlock करके न दें।

  • Payment receipt, tracking status, courier messages और संबंधित बातचीत संभालकर रखें।

  • अगर parcel मिल जाए लेकिन tracking में cancelled या returned दिखे, तो तुरंत official customer support से लिखित पुष्टि लें।

और सबसे जरूरी बात—

Delivery agent का नाम या uniform देखकर ही पूरी प्रक्रिया पर भरोसा मत कीजिए। Payment और OTP का उद्देश्य भी समझिए।

यह सलाह हर courier company और हर online order के लिए उपयोगी है।

10. अब मैं इस मामले में क्या चाहता हूँ?

मैं चाहता हूँ कि इस घटना की वास्तविक स्थिति सामने आए।

अगर payment अधिकृत था, तो इसकी पुष्टि की जाए।

अगर cancellation किसी technical error से हुआ, तो उसे सुधारा जाए और सही delivery status दर्ज किया जाए।

अगर किसी व्यक्ति ने payment collection या delivery process का दुरुपयोग किया, तो कंपनी इसकी जाँच करके उचित कार्रवाई करे।

मैं यह भी चाहता हूँ कि seller के records में यह स्पष्ट हो कि parcel वास्तव में customer तक पहुँचा था और उसका payment किस खाते में प्राप्त हुआ।

मेरे पास Paytm transaction का screenshot है।

मेरे पास Delhivery के नाम से आया cancellation message है।

और मेरे पास पूरी घटना का समय तथा क्रम है।

इन सबकी मदद से इस घटना की जाँच की जा सकती है।

मुझे किसी पर बिना प्रमाण आरोप नहीं लगाना है। मुझे बस यह जानना है कि आखिर हुआ क्या था।


अंत में… एक सीधी-सी बात

कल तक मुझे लगता था कि online parcel की सबसे बड़ी परेशानी देर से delivery होना या parcel का non-deliverable mark हो जाना है।

लेकिन आज की घटना के बाद मुझे लगता है कि उससे भी जरूरी सवाल है—

जो parcel हमें दिया जा रहा है, क्या उसकी payment और delivery का record भी सही तरीके से दर्ज हो रहा है?

मेरा parcel मेरे हाथ में है।

₹1,719 का payment भी successful दिख रहा है।

लेकिन delivery cancellation का message इस पूरी घटना को संदिग्ध बना रहा है।

इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस मामले की जाँच हो, payment की अधिकृत स्थिति स्पष्ट की जाए और delivery records को verify किया जाए।

क्योंकि online shopping में भरोसा बहुत महत्वपूर्ण है।

Customer पैसा देता है, seller सामान भेजता है और courier company उस सामान को सही व्यक्ति तक पहुँचाने की जिम्मेदारी निभाती है।

अगर इन तीनों के बीच payment या delivery records को लेकर भ्रम पैदा हो जाए, तो नुकसान केवल किसी एक order तक सीमित नहीं रहता—ग्राहक का भरोसा भी प्रभावित होता है।

सुविधा के नाम पर हम अपनी सावधानी नहीं छोड़ सकते।

और कंपनियाँ भी अपनी delivery और payment collection प्रक्रिया को इतना पारदर्शी बनाएँ कि customer को बाद में यह न सोचना पड़े कि उसका पैसा कहाँ गया और उसका parcel किस status में दर्ज हुआ।

आज की घटना ने मुझे यही सिखाया।

सतर्क रहिए। Transaction verify कीजिए। OTP पढ़े बिना साझा मत कीजिए। और कोई गड़बड़ी लगे तो चुप मत रहिए।

आपकी राय क्या है?

क्या आपने भी कभी COD delivery, personal UPI payment या गलत delivery status से जुड़ी ऐसी परेशानी का सामना किया है? अपना अनुभव साझा कीजिए, ताकि दूसरे लोग भी सतर्क रह सकें।

🙏 धन्यवाद।

— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
www.devvaidik.in


Sunday, October 11, 2026

नवरात्रि का पहला दिन: उपवास, माँ शक्ति की आराधना और 24,000 गायत्री मंत्रों का मेरा संकल्प

 कुछ यात्राएँ बाहर नहीं, भीतर शुरू होती हैं…


🚩 जय माता दी! 🙏

आज मेरे लिए नवरात्रि का पहला दिन है।

आज से मेरे उपवास की शुरुआत हो रही है। इसके साथ ही मैंने 24,000 गायत्री मंत्रों के अनुष्ठान का संकल्प भी लिया है।

मेरे लिए यह केवल पूजा-पाठ या कोई धार्मिक परंपरा निभाने की बात नहीं है। यह स्वयं को भीतर से अनुशासित करने, अपनी आस्था के साथ जुड़ने और अपने मन को ईश्वर की ओर लगाने का एक व्यक्तिगत प्रयास है।

आज मन में एक अलग ही भाव है।

एक तरफ माँ दुर्गा की आराधना का उत्साह है, दूसरी तरफ गायत्री मंत्र की साधना का संकल्प।

मन में श्रद्धा है, लेकिन साथ ही यह एहसास भी है कि साधना केवल संकल्प लेने से पूरी नहीं होती। उसके लिए नियमितता, धैर्य, संयम और सच्चे मन से प्रयास करना पड़ता है।

आज से मेरी एक नई आध्यात्मिक यात्रा शुरू हो रही है।

नवरात्रि: केवल नौ दिन का उत्सव नहीं

हमारे यहाँ नवरात्रि आते ही वातावरण बदलने लगता है।

मंदिरों में सजावट, घरों में पूजा की तैयारी, माता रानी के भजन, आरती और जयकारे—हर तरफ भक्ति का रंग दिखाई देता है।

लेकिन मेरे विचार से नवरात्रि का अर्थ केवल उत्सव मनाना नहीं है।

यह अपने भीतर झाँकने का अवसर भी है।

हम अपने जीवन में कितनी भागदौड़ करते हैं। काम, परिवार, जिम्मेदारियाँ, भविष्य की चिंता और रोजमर्रा की परेशानियाँ—इन सबके बीच कई बार हम स्वयं के लिए भी समय नहीं निकाल पाते।

ऐसे में नवरात्रि हमें थोड़ा रुकने, अपने मन को समझने और अपनी प्राथमिकताओं पर विचार करने का अवसर देती है।

मेरे लिए उपवास का एक अर्थ यह भी है कि कुछ समय अपने मन और आदतों पर ध्यान दिया जाए।

केवल शरीर की दिनचर्या में बदलाव नहीं, बल्कि विचारों और व्यवहार में भी बेहतर बदलाव लाने का प्रयास किया जाए।

अगर नवरात्रि के नौ दिन हमें थोड़ा अधिक संयमी, थोड़ा अधिक धैर्यवान और थोड़ा अधिक संवेदनशील बना दें, तो यह भी साधना की एक सुंदर उपलब्धि है।

24,000 गायत्री मंत्रों का अनुष्ठान: मेरा व्यक्तिगत संकल्प

आज मैंने 24,000 गायत्री मंत्रों के अनुष्ठान का संकल्प लिया है।

गायत्री मंत्र का मेरे लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह भारतीय सनातन परंपरा का एक अत्यंत प्रतिष्ठित मंत्र है, जिसका संबंध प्रकाश, प्रार्थना और बुद्धि को सद्मार्ग की ओर प्रेरित करने की भावना से जोड़ा जाता है।

मंत्र है—

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

इस मंत्र में मुझे सबसे अधिक प्रेरित करने वाली भावना है—हमारी बुद्धि सही दिशा में चले, हमारे विचार निर्मल हों और हम विवेक के साथ जीवन जी सकें।

मेरे लिए 24,000 मंत्रों का यह संकल्प केवल एक संख्या पूरी करने का विषय नहीं है।

यह नियमितता का संकल्प है।

ध्यानपूर्वक जप करने का संकल्प है।

अपने मन को बार-बार भटकने से रोककर साधना में लगाने का प्रयास है।

और सबसे बढ़कर, अपने भीतर सद्बुद्धि, धैर्य और सकारात्मकता के लिए प्रार्थना करने का अवसर है।

मैं यह नहीं मानता कि केवल मंत्रों की संख्या से किसी व्यक्ति की महानता तय होती है। मेरे विचार से साधना का महत्व श्रद्धा, नियमितता, समझ और हमारे वास्तविक आचरण में भी दिखाई देना चाहिए।

मंत्र का जप करते समय जिस सद्बुद्धि की प्रार्थना की जाए, उस सद्बुद्धि को अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी होना चाहिए।

उपवास का अर्थ केवल भोजन से दूरी नहीं

उपवास की अपनी धार्मिक परंपराएँ और नियम होते हैं। हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इसका पालन करता है।

मेरे लिए इस नवरात्रि का उपवास आत्मसंयम को याद करने का अवसर भी है।

भोजन पर संयम रखने के साथ-साथ वाणी पर संयम रखना भी जरूरी है।

क्रोध पर नियंत्रण रखना भी जरूरी है।

अनावश्यक विवादों से दूर रहना भी जरूरी है।

किसी के प्रति मन में कटुता हो, तो उस पर विचार करना भी जरूरी है।

हम कई बार पूजा में बैठकर भगवान से शांति माँगते हैं, लेकिन सामान्य जीवन में छोटी-छोटी बातों पर अपना धैर्य खो देते हैं।

हम ईश्वर से अच्छे परिणाम चाहते हैं, लेकिन अपने व्यवहार को बेहतर बनाने का प्रयास भूल जाते हैं।

इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस नवरात्रि मेरी साधना केवल पूजा के समय तक सीमित न रहे।

मेरे विचारों में, मेरी वाणी में और मेरे व्यवहार में भी संयम दिखाई दे।

यही मेरे उपवास को अधिक सार्थक बनाने का एक प्रयास होगा।

गायत्री मंत्र और सद्बुद्धि की प्रार्थना

जीवन में हम अक्सर सफलता, समृद्धि, स्वास्थ्य और सुख की कामना करते हैं।

यह स्वाभाविक है।

लेकिन मेरे विचार से सद्बुद्धि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

क्योंकि सफलता मिलने पर उसका सही उपयोग कैसे करना है, यह सद्बुद्धि सिखाती है।

कठिन परिस्थिति आने पर धैर्य कैसे रखना है, यह विवेक सिखाता है।

किसी निर्णय में लाभ और हानि के साथ सही और गलत के बीच अंतर कैसे करना है, यह समझ आवश्यक बनाती है।

गायत्री मंत्र के जप के दौरान मेरी प्रार्थना भी इसी भावना से जुड़ी है—

हे परमात्मा, मुझे सही दिशा में सोचने की प्रेरणा मिले।

मेरे निर्णय विवेकपूर्ण हों।

मैं अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभा सकूँ।

मैं अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार रहूँ।

और जीवन में सफलता मिले तो अहंकार से बच सकूँ, कठिनाइयाँ आएँ तो धैर्य न खोऊँ।

यही वह भावना है, जिसे मैं अपनी साधना से जोड़ना चाहता हूँ।

धर्म केवल पूजा में नहीं, कर्म में भी दिखाई देना चाहिए

मैं सनातनी हिंदू हूँ और अपनी संस्कृति पर गर्व करता हूँ।

मेरे लिए मंदिर जाना, मंत्र जप करना और धार्मिक परंपराओं का पालन करना जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि धर्म का वास्तविक प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।

अगर हम मंत्र जप करते हैं, तो हमारी वाणी में कठोरता कम करने का प्रयास होना चाहिए।

अगर हम ईश्वर के सामने सिर झुकाते हैं, तो जीवन में अहंकार को भी कम करने का प्रयास करना चाहिए।

अगर हम अपने लिए शांति की प्रार्थना करते हैं, तो दूसरों के जीवन में अनावश्यक अशांति पैदा करने से भी बचना चाहिए।

अगर हम सद्बुद्धि की कामना करते हैं, तो अपने निर्णयों में विवेक को स्थान देना चाहिए।

मेरे लिए सनातन केवल आस्था की पहचान नहीं, बल्कि अपने जीवन को बेहतर बनाने की सतत प्रेरणा भी है।

मैं पूर्ण नहीं हूँ। मुझसे भी गलतियाँ होती होंगी। लेकिन साधना का एक सुंदर पक्ष यह भी है कि व्यक्ति स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास जारी रख सकता है।

इस नवरात्रि मेरा संकल्प

आज नवरात्रि के पहले दिन मैं अपने लिए कुछ संकल्प रखना चाहता हूँ।

मैं अपनी साधना को श्रद्धा और नियमितता के साथ पूरा करने का प्रयास करूँगा।

मैं गायत्री मंत्र के अर्थ और उसकी भावना को ध्यान में रखते हुए जप करने का प्रयास करूँगा।

मैं अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाने पर ध्यान दूँगा।

मैं अपनी वाणी और व्यवहार में संयम रखने का प्रयास करूँगा।

मैं अपनी धार्मिक आस्था को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों में भी व्यक्त करने की कोशिश करूँगा।

और सबसे महत्वपूर्ण—मैं यह याद रखूँगा कि आध्यात्मिक यात्रा किसी दूसरे से अपनी तुलना करने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और बेहतर बनाने के लिए होती है।

ये संकल्प किसी को उपदेश देने के लिए नहीं हैं। ये स्वयं को याद दिलाने वाली बातें हैं।

क्योंकि दूसरों को सलाह देना आसान है, लेकिन अपने जीवन में उन बातों को उतारने का प्रयास करना ही वास्तविक चुनौती है।

साधना का अनुभव हर व्यक्ति का अपना होता है

हर व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा अलग होती है।

किसी को मंदिर में बैठकर शांति मिलती है।

किसी को मंत्र जप में एकाग्रता मिलती है।

किसी को सेवा में संतोष मिलता है।

और किसी को मौन में स्वयं को समझने का अवसर मिलता है।

इन अनुभवों की तुलना करना आवश्यक नहीं है।

मेरे लिए इस समय गायत्री मंत्र का अनुष्ठान और नवरात्रि का उपवास मेरी व्यक्तिगत श्रद्धा का हिस्सा हैं।

मैं इसे एक विनम्र प्रयास के रूप में देखता हूँ—अपने मन को साधना से जोड़ने, अपने विचारों पर ध्यान देने और जीवन को अधिक जागरूकता के साथ जीने का प्रयास।

साधना का अनुभव कैसा रहेगा, यह आने वाला समय बताएगा।

लेकिन आज संकल्प लेने के साथ ही एक नई शुरुआत का अनुभव जरूर हो रहा है।

और कभी-कभी जीवन में नई शुरुआत करना ही अपने आप में महत्वपूर्ण होता है।

अंत में…

आज नवरात्रि का पहला दिन है।

माँ दुर्गा के चरणों में नमन करते हुए और गायत्री मंत्र के अनुष्ठान का संकल्प लेते हुए मन में एक ही प्रार्थना है—

हे माँ, मुझे शक्ति दीजिए कि मैं अपने कर्तव्यों से पीछे न हटूँ।

हे गायत्री माता, मुझे सद्बुद्धि और विवेक की प्रेरणा मिले।

मेरे विचारों में स्पष्टता हो।

मेरे कर्मों में ईमानदारी हो।

मेरी वाणी में संयम हो।

और मेरे भीतर इतनी विनम्रता बनी रहे कि मैं हमेशा सीखने और स्वयं को सुधारने के लिए तैयार रहूँ।

मेरे लिए यह नवरात्रि केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपने भीतर एक बेहतर शुरुआत करने का अवसर है।

आज संकल्प लिया है।

अब प्रयास है कि इस संकल्प को श्रद्धा, अनुशासन और धैर्य के साथ निभा सकूँ।

आप सभी को शारदीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ।

माँ दुर्गा आप सभी के जीवन में शक्ति, साहस और सद्बुद्धि का संचार करें।

🙏 जय माता दी!

🕉️ ॐ भूर्भुवः स्वः।

🚩 जय श्री राम। हर हर महादेव।

— देव वैदिक
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Saturday, October 10, 2026

दिल्ली में आज जो हुआ, वह सिर्फ विरोध-प्रदर्शन नहीं है! लोकतंत्र, कानून और जिम्मेदारी की असली परीक्षा

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…

नमस्कार! 🙏

आज दिल्ली में जो कुछ हुआ, उसने फिर एक बार देश के सामने कुछ जरूरी सवाल खड़े कर दिए हैं।

सड़कें, बैरिकेड, भारी पुलिस बल, प्रदर्शनकारी, हिरासत और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप।

किसी के लिए यह लोकतंत्र बचाने की लड़ाई है।

किसी के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती।

और किसी के लिए यह राजनीतिक लड़ाई में अपनी जगह मजबूत करने का मौका।

लेकिन मेरे मन में एक सीधा सवाल है—

क्या हम लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह बना पा रहे हैं, या हर असहमति को अपनी राजनीतिक लड़ाई का हथियार बना रहे हैं?

आज इसी पर बात करते हैं। बिना किसी राजनीतिक चश्मे को आँखों पर चढ़ाए।

दिल्ली में आखिर हुआ क्या?

आज, 10 अक्टूबर को दिल्ली में Cockroach Janta Party और दूसरे प्रदर्शनकारी समूहों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किए।

इस विरोध का संबंध मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR से है। विपक्ष और प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में किए गए बदलावों पर सवाल उठाए हैं।

पुलिस ने बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था की। जंतर-मंतर जाने वाले रास्तों पर पाबंदियाँ लगाई गईं और कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।

स्रोत: Reuters की रिपोर्ट और The Indian Express की रिपोर्ट।

अब सवाल है कि इस पूरे घटनाक्रम को हम किस नजर से देखें?

मेरी राय में, न तो हर प्रदर्शनकारी गलत है और न ही हर पुलिसकर्मी को राजनीतिक चश्मे से देखना उचित है।

मुद्दे को समझना जरूरी है।

पहला सवाल: क्या सरकार और प्रशासन से सवाल पूछना गलत है?

बिल्कुल नहीं।

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है।

चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठें, तो उनका जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए।

अगर मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम गलत तरीके से हट गया है, तो उसकी शिकायत सुनी जानी चाहिए।

अगर नियमों को लेकर भ्रम है, तो उसे दूर किया जाना चाहिए।

और अगर कोई आरोप गलत है, तो उसका जवाब सबूतों के साथ दिया जाना चाहिए।

लेकिन यहाँ एक अंतर समझना जरूरी है।

आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं।

मतदाता सूची में बदलावों को लेकर विपक्ष ने गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और BJP ने अनियमितता के आरोपों को खारिज किया है।

इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले तथ्यों, संबंधित रिकॉर्ड और आधिकारिक जवाबों को देखना चाहिए।

लोकतंत्र में सवालों की जगह होनी चाहिए, लेकिन जवाब भी तथ्यों पर आधारित होने चाहिए।

दूसरा सवाल: क्या विरोध-प्रदर्शन के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है?

यहाँ मेरा जवाब भी स्पष्ट है।

नहीं!

लोकतंत्र में विरोध करने का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा, दूसरे नागरिकों के अधिकार और कानून का पालन भी महत्वपूर्ण हैं।

किसी प्रदर्शन के कारण आम नागरिकों की आवाजाही बाधित होती है, कार्यालय बंद होते हैं या विद्यार्थियों और मरीजों को परेशानी होती है, तो प्रशासन के सामने वास्तविक चुनौती होती है।

लेकिन इसका समाधान केवल अधिक बैरिकेड और अधिक हिरासत भी नहीं हो सकता।

प्रशासन को यह देखना चाहिए कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए व्यावहारिक व्यवस्था कैसे बनाई जाए।

जहाँ प्रतिबंध जरूरी हों, वहाँ उनका आधार स्पष्ट हो।

कार्रवाई जरूरी हो, तो वह उचित और अनुपातिक हो।

और किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाए, तो उसकी स्थिति, कानूनी प्रक्रिया और अधिकारों के संबंध में पारदर्शिता बनी रहनी चाहिए।

कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। नागरिक अधिकारों का सम्मान करना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

दोनों में संतुलन बनाना ही असली प्रशासनिक क्षमता है।

तीसरा सवाल: मैं BJP के करीब हूँ, तो क्या हर बात पर समर्थन करूँ?

मैं अपनी राजनीतिक सोच छिपाता नहीं हूँ।

मैं BJP के राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के काफी करीब हूँ।

मुझे भारत की सभ्यता पर गर्व है। मैं चाहता हूँ कि हमारा देश मजबूत हो, हमारी संवैधानिक संस्थाएँ विश्वसनीय रहें और भारत का लोकतंत्र दुनिया के सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करे।

लेकिन केवल इसलिए कि मैं BJP के करीब हूँ, मुझे हर सरकारी निर्णय का बिना सोचे समर्थन करना चाहिए—ऐसा मैं नहीं मानता।

किसी पार्टी का समर्थन करना और उसकी हर बात को सही मान लेना अलग-अलग बातें हैं।

सरकार अच्छा काम करे, तो उसका समर्थन होना चाहिए।

अगर किसी नीतिगत निर्णय पर वैध सवाल उठते हैं, तो जवाब भी मिलने चाहिए।

और अगर विपक्ष बिना पर्याप्त प्रमाण के आरोप लगाता है, तो उसकी आलोचना भी तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।

मेरे लिए राष्ट्रहित किसी एक पार्टी के प्रति निष्ठा से बड़ा है।

यह बात BJP पर भी लागू होती है और विपक्ष पर भी।

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता क्यों जरूरी है?

चुनाव केवल मतदान की एक तारीख नहीं है।

चुनाव वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है।

इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता महत्वपूर्ण है।

गलत प्रविष्टियों को सुधारना जरूरी है। मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को अद्यतन करना भी प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना उतना ही आवश्यक है कि कोई पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो।

यही असली कसौटी होनी चाहिए।

मतदाता सूची साफ होनी चाहिए और हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित रहना चाहिए।

अगर किसी व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हटता है, तो उसके पास उसे ठीक कराने का स्पष्ट और प्रभावी रास्ता होना चाहिए।

अगर प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, तो संबंधित संस्था को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।

और अगर आरोप तथ्यहीन हैं, तो उन्हें भी प्रमाणों के आधार पर खारिज किया जाना चाहिए।

लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा केवल बयान देने से नहीं बनता।

वह निष्पक्ष प्रक्रिया, पारदर्शिता और जवाबदेही से बनता है।

भीड़ बनना आसान है, जागरूक नागरिक बनना मुश्किल

आज सोशल मीडिया का जमाना है।

किसी प्रदर्शन का वीडियो आया नहीं कि लोग पक्ष और विपक्ष में बँट जाते हैं।

कोई एक पक्ष को देशद्रोही बताने लगता है।

कोई दूसरे पक्ष को तानाशाह कहने लगता है।

और कुछ लोग बिना पूरी खबर पढ़े ही अपना फैसला सुना देते हैं।

भाई साहब, थोड़ा रुकिए!

एक वीडियो पूरी घटना नहीं होता।

एक राजनीतिक बयान पूरा सच नहीं होता।

और किसी पोस्ट पर हजारों लोगों के सहमत होने से वह तथ्य नहीं बन जाती।

किसी भी घटना को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि विवाद किस बात पर है, प्रशासन का पक्ष क्या है, प्रदर्शनकारी क्या मांग रहे हैं और उपलब्ध प्रमाण क्या बताते हैं।

राय रखना आपका अधिकार है। लेकिन राय बनाने से पहले तथ्य जानना आपकी जिम्मेदारी है।

मेरा मानना है कि भारत को केवल राजनीतिक रूप से सक्रिय नागरिकों की नहीं, बल्कि विवेकशील नागरिकों की भी जरूरत है।

लोकतंत्र की असली ताकत क्या है?

मेरी नजर में लोकतंत्र की ताकत केवल चुनाव जीतने में नहीं है।

उसकी ताकत इस बात में है कि चुनाव हारने वाला भी व्यवस्था पर भरोसा कर सके, जीतने वाला अपनी जवाबदेही समझे और आम नागरिक बिना डर के अपनी बात रख सके।

प्रशासन कानून लागू करे।

राजनीतिक दल जिम्मेदारी से व्यवहार करें।

नागरिक तथ्यों के आधार पर अपनी राय बनाएँ।

और संवैधानिक संस्थाएँ अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता के साथ काम करें।

यही एक मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।

आज दिल्ली में जो घटनाएँ सामने आई हैं, वे इन सवालों पर विचार करने का अवसर देती हैं।

इसलिए मैं इसे केवल BJP बनाम विपक्ष का मामला बनाकर नहीं देखना चाहता।

यह नागरिक अधिकारों, सार्वजनिक व्यवस्था, चुनावी पारदर्शिता और राजनीतिक जिम्मेदारी से जुड़ा विषय भी है।

अंत में, मेरी बात

मैं चाहता हूँ कि भारत मजबूत बने।

मैं चाहता हूँ कि हमारी सरकारें प्रभावी ढंग से काम करें।

मैं चाहता हूँ कि विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण हों और आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो।

मैं यह भी चाहता हूँ कि सरकार और प्रशासन नागरिकों के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार रहें।

और मैं चाहता हूँ कि चुनाव प्रक्रिया पर उठने वाले गंभीर सवालों की जाँच तथ्यों के आधार पर हो, न कि केवल राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर।

इनमें से किसी एक बात को चुनकर बाकी बातों को छोड़ देने से समस्या हल नहीं होगी।

राष्ट्रहित का अर्थ केवल सरकार का समर्थन करना नहीं है। राष्ट्रहित का अर्थ देश की संस्थाओं, नागरिकों के अधिकारों और कानून के शासन को मजबूत बनाना भी है।

दिल्ली की आज की घटना से हमें यही सबक लेना चाहिए।

विरोध हो, लेकिन हिंसा नहीं।

प्रशासन मजबूत हो, लेकिन जवाबदेही से दूर नहीं।

राजनीति हो, लेकिन तथ्यों को कुचलकर नहीं।

और राष्ट्रवाद हो, तो उसमें देश की संवैधानिक व्यवस्था के प्रति सम्मान भी शामिल हो।

क्योंकि अंततः—

सरकारें बदलती रहती हैं। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं। लेकिन भारत और उसका लोकतंत्र हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

यही मेरी सोच है।

आपकी क्या राय है?

क्या आज की स्थिति में शांतिपूर्ण विरोध और मजबूत कानून-व्यवस्था के बीच बेहतर संतुलन संभव है? अपनी राय तथ्यों और तर्कों के साथ जरूर साझा कीजिए।

🙏 जय हिंद। वंदे मातरम्।

— देव वैदिक
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Friday, October 09, 2026

नवरात्रि में माँ दुर्गा की पूजा, लेकिन स्त्री का सम्मान कहाँ है?



मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…

जय माता दी! 🙏🚩

नवरात्रि आने वाली है।

बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। कहीं माता रानी के दरबार सज रहे हैं, कहीं पंडालों की तैयारी चल रही है, तो कहीं गरबा और डांडिया की योजनाएँ बन रही हैं। घरों में पूजा की सामग्री जुटाई जा रही है। सोशल मीडिया पर भी जल्द ही माँ दुर्गा की तस्वीरें, भक्ति गीत और जयकारे दिखाई देने लगेंगे।

अच्छा लगता है यह सब देखकर।

मन में श्रद्धा जागती है। अपनी संस्कृति पर गर्व होता है। लगता है कि हमारी परंपराएँ आज भी जीवित हैं।

लेकिन इसी बीच मेरे मन में एक सवाल आया।

हम माँ दुर्गा की पूजा तो बड़े उत्साह से करते हैं, लेकिन क्या हम अपने जीवन में स्त्री का सम्मान भी उसी श्रद्धा से करते हैं?

सवाल थोड़ा असहज है, लेकिन मुझे लगता है कि इस पर बात होनी चाहिए।

क्योंकि धर्म का अर्थ केवल वह नहीं है जो हम मंदिर में करते हैं। धर्म का संबंध उस व्यवहार से भी है, जो हम मंदिर से बाहर निकलने के बाद करते हैं।

और आज मैं इसी विषय पर अपनी बात रखना चाहता हूँ।

माँ दुर्गा की आराधना और हमारी जिम्मेदारी

सनातन परंपरा में शक्ति की उपासना का विशेष स्थान है।

हम माँ दुर्गा को शक्ति का स्वरूप मानते हैं। माँ लक्ष्मी को समृद्धि और माँ सरस्वती को ज्ञान की देवी के रूप में पूजते हैं।

हमारे यहाँ स्त्री के विभिन्न स्वरूपों को देवी से जोड़कर देखा जाता है।

यह हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन मेरे मन में सवाल उठता है कि जब हमारी परंपरा स्त्री को इतना सम्मान देती है, तो उस सम्मान की झलक हमारे रोजमर्रा के जीवन में कितनी दिखाई देती है?

मंदिर में माँ के सामने सिर झुकाना आसान है।

लेकिन घर की माँ की बात धैर्य से सुनना भी जरूरी है।

माँ दुर्गा की आरती करना अच्छी बात है।

लेकिन अपनी पत्नी के सपनों और इच्छाओं को महत्व देना भी जरूरी है।

कन्या पूजन करना श्रद्धा का विषय है।

लेकिन अपनी बेटी को बिना डर के आगे बढ़ने का अवसर देना भी उतना ही जरूरी है।

और बहन को देवी कहकर संबोधित करना तभी सार्थक लगता है, जब उसकी स्वतंत्रता, निर्णय और सम्मान का भी आदर किया जाए।

यही वह जगह है, जहाँ हमारी आस्था और हमारा आचरण एक-दूसरे से मिलते हैं।

असली सवाल लड़कियों से नहीं, लड़कों की परवरिश से भी पूछिए

हम अक्सर बेटियों को समझाते हैं।

ध्यान से रहना।

देर तक बाहर मत रहना।

किसी अनजान व्यक्ति पर भरोसा मत करना।

अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना।

इन बातों का अपना महत्व है। सावधानी जरूरी है।

लेकिन क्या हम अपने बेटों को भी उतनी गंभीरता से समझाते हैं?

क्या हम उन्हें सिखाते हैं कि किसी महिला से बातचीत कैसे करनी चाहिए?

क्या हम उन्हें बताते हैं कि किसी की असहमति का सम्मान करना क्या होता है?

क्या हम समझाते हैं कि किसी लड़की का आधुनिक कपड़े पहनना, अकेले घूमना या अपनी पसंद का जीवन चुनना किसी को उसके चरित्र पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं देता?

और सबसे महत्वपूर्ण बात—

क्या हम अपने बेटों को यह सिखाते हैं कि सम्मान कोई एहसान नहीं, बल्कि हर इंसान का अधिकार है?

मेरी राय में, अच्छी परवरिश का अर्थ केवल अपने बच्चे को सफल बनाना नहीं है।

उसे ऐसा इंसान बनाना भी है, जिसके व्यवहार से दूसरे लोग सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें।

बेटियों को मजबूत बनाइए, बिल्कुल बनाइए।

लेकिन बेटों को जिम्मेदार बनाना भी मत भूलिए।

समाज तभी बेहतर होगा, जब जिम्मेदारी दोनों तरफ समझी जाएगी।

सनातन केवल पहचान नहीं, आचरण भी है

मैं अपनी सनातन पहचान पर गर्व करता हूँ।

मुझे मंदिरों से लगाव है। मुझे भारतीय त्योहार अच्छे लगते हैं। मुझे अपनी संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ाव महसूस होता है।

मैं चाहता हूँ कि हमारी अगली पीढ़ी भी अपनी जड़ों को समझे और उन पर गर्व करे।

लेकिन मेरे लिए सनातन का अर्थ केवल धार्मिक प्रतीकों तक सीमित नहीं है।

मेरे लिए इसका संबंध सत्य, कर्तव्य, मर्यादा, करुणा और आत्मसंयम जैसे मूल्यों से भी है।

अगर माथे पर तिलक है, तो व्यवहार में विनम्रता भी होनी चाहिए।

अगर जुबान पर भगवान का नाम है, तो शब्दों में मर्यादा भी होनी चाहिए।

अगर हम धर्म की रक्षा की बात करते हैं, तो अपने आचरण की कमियों को सुधारने का साहस भी होना चाहिए।

किसी को सनातनी कहलाने से पहले अपनी आस्था का प्रमाण नहीं देना चाहिए, लेकिन अपने आचरण में उसके मूल्यों को उतारने का प्रयास जरूर करना चाहिए।

और यह बात केवल हिंदुओं के लिए नहीं है। हर धर्म और हर समाज में अपने मूल्यों को व्यवहार में उतारने की जिम्मेदारी होती है।

राजनीति अपनी जगह, सामाजिक जिम्मेदारी अपनी जगह

अब कोई यह भी पूछ सकता है कि क्या महिलाओं के सम्मान पर बात करना केवल सामाजिक विषय है या राजनीतिक भी?

मेरे विचार से यह दोनों है।

सरकार की जिम्मेदारी है कि कानून-व्यवस्था मजबूत हो, महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की निष्पक्ष जाँच हो, दोषियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो और पीड़ितों को न्याय मिले।

परिवार की जिम्मेदारी है कि बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित हों।

समाज की जिम्मेदारी है कि गलत व्यवहार को सामान्य मानकर नजरअंदाज न किया जाए।

और व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह खुद अपने आचरण पर ध्यान दे।

मैं राजनीतिक रूप से BJP के राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के काफी करीब हूँ। अपनी विचारधारा को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं है।

लेकिन मेरी दृष्टि में भारतीय संस्कृति का सम्मान केवल भाषणों से नहीं होगा। इसके लिए हमें अपने समाज की वास्तविक समस्याओं पर भी गंभीरता से काम करना होगा।

महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक अवसर और न्याय तक उनकी पहुँच ऐसे विषय हैं, जिन पर सरकार, प्रशासन, परिवार और समाज—सभी की भूमिका है।

राजनीति में किसी विचारधारा का समर्थन करना अपनी जगह है, लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी किसी पार्टी की सीमा में बँधी हुई नहीं होती।

जो बात सही है, उसका समर्थन होना चाहिए। जो समस्या वास्तविक है, उसका समाधान भी होना चाहिए।

सोशल मीडिया पर देवी, व्यवहार में क्या?

आज सोशल मीडिया के जमाने में भक्ति दिखाना पहले से कहीं आसान हो गया है।

माँ दुर्गा की तस्वीर लगाइए।

भजन साझा कीजिए।

जय माता दी लिखिए।

मंदिर की सुंदर तस्वीर पोस्ट कीजिए।

इसमें कोई बुराई नहीं है। भक्ति व्यक्त करने के अनेक तरीके हो सकते हैं।

लेकिन एक छोटा-सा सवाल अपने आप से भी पूछिए।

जब घर में माँ कुछ कहती हैं, तो क्या हम उनकी बात सुनते हैं?

जब पत्नी असहमत होती है, तो क्या हम उसकी राय का सम्मान करते हैं?

जब किसी महिला सहकर्मी को काम में सफलता मिलती है, तो क्या हम उसकी मेहनत को स्वीकार करते हैं?

जब सड़क पर किसी महिला के साथ अनुचित व्यवहार होता है, तो क्या हम कम-से-कम उचित और सुरक्षित तरीके से मदद करने की कोशिश करते हैं?

या फिर हमारी सारी सक्रियता सोशल मीडिया के पोस्ट तक ही सीमित रह जाती है?

भक्ति की तस्वीर पोस्ट करना आसान है। अपने व्यवहार से सम्मान प्रदर्शित करना ज्यादा कठिन, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण है।

मेरे हिसाब से यही आत्मचिंतन नवरात्रि को और सार्थक बना सकता है।

माँ दुर्गा से शक्ति माँगिए, लेकिन अपने भीतर भी बदलाव लाइए

नवरात्रि में हम माँ से शक्ति माँगते हैं।

संकटों से लड़ने की शक्ति।

गलत के सामने खड़े होने की शक्ति।

परिवार को संभालने की शक्ति।

जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति।

लेकिन क्या हम अपने भीतर की कमियों से लड़ने की शक्ति भी माँगते हैं?

क्रोध पर नियंत्रण रखने की शक्ति।

दूसरे की बात सुनने की शक्ति।

अपनी गलती स्वीकार करने की शक्ति।

अहंकार छोड़ने की शक्ति।

और जरूरत पड़ने पर अपने ही गलत व्यवहार को बदलने की शक्ति।

मुझे लगता है कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

क्योंकि शक्ति का अर्थ केवल दूसरों पर प्रभाव जमाना नहीं है।

कभी-कभी असली शक्ति अपने भीतर झाँककर खुद को सुधारने में होती है।

माँ दुर्गा की आराधना करते हुए अगर हम थोड़ा अधिक संवेदनशील, थोड़ा अधिक न्यायप्रिय और थोड़ा अधिक जिम्मेदार इंसान बन सकें, तो यह भी हमारी साधना का एक सुंदर परिणाम होगा।

इस नवरात्रि एक छोटा-सा संकल्प लीजिए

इस बार माता रानी के सामने दीपक जलाते समय एक संकल्प अपने लिए भी रखिए।

हम अपने घर की महिलाओं को सम्मान देंगे।

बेटियों और बेटों—दोनों को जिम्मेदारी और समान गरिमा का महत्व सिखाएँगे।

किसी महिला के पहनावे, स्वतंत्रता या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर उसके चरित्र का फैसला नहीं करेंगे।

गलत व्यवहार का समर्थन केवल इसलिए नहीं करेंगे कि गलती करने वाला हमारा परिचित है।

और जहाँ संभव हो, अपने परिवार और समाज में ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करेंगे जहाँ महिलाएँ अपनी बात बिना अनावश्यक भय के रख सकें।

यह कोई बहुत बड़ी या असंभव सूची नहीं है।

शुरुआत हमारे अपने व्यवहार से हो सकती है।

और बदलाव की शुरुआत अक्सर वहीं से होती है।

अंत में, मेरी बात बस इतनी-सी है…

नवरात्रि में माँ दुर्गा की पूजा जरूर कीजिए।

मंदिर जाइए।

आरती कीजिए।

व्रत रखिए, अपनी परंपरा के अनुसार उत्सव मनाइए।

गरबा खेलिए, डांडिया कीजिए और परिवार के साथ खुशियाँ बाँटिए।

लेकिन इन सबके बीच उस मूल भावना को भी याद रखिए, जिसके साथ हम माँ शक्ति की आराधना करते हैं।

जिस समाज में देवी की पूजा होती है, उस समाज को स्त्री के सम्मान के लिए भी उतना ही गंभीर होना चाहिए।

और सम्मान का अर्थ केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है।

सम्मान का अर्थ है—उसकी बात सुनना, उसके निर्णयों का आदर करना, उसके अवसरों को सीमित न करना और उसे एक स्वतंत्र, समान अधिकारों वाले इंसान के रूप में स्वीकार करना।

मेरे लिए सनातन का गौरव केवल हमारी प्राचीन परंपराओं में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए उनसे क्या सीखते हैं।

इसलिए इस नवरात्रि मैं अपने आप से यही सवाल पूछना चाहता हूँ—

मैं माँ दुर्गा की पूजा तो करता हूँ, लेकिन क्या मैं उनके नाम से जुड़े शक्ति और सम्मान के संदेश को अपने व्यवहार में भी उतार रहा हूँ?

इस सवाल का जवाब हर व्यक्ति को स्वयं खोजना है।

क्योंकि धर्म केवल कहने की चीज नहीं है। वह हमारे कर्मों में भी दिखाई देना चाहिए।

🙏 जय माता दी!

🚩 जय श्री राम!

🔱 हर हर महादेव!

— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
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Thursday, October 08, 2026

गरबा में कौन आए? सवाल धर्म का है या संस्कृति की मर्यादा का?

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…

नमस्कार।

नवरात्रि है।

चारों तरफ माँ दुर्गा की भक्ति है।
कहीं पंडाल सजे हैं, कहीं आरती हो रही है, कहीं डांडिया है और कहीं गरबा।

रात में ढोल की आवाज सुनाई देती है—


“जय माता दी!”

चेहरों पर उत्साह है।

युवा पीढ़ी अपनी मस्ती में है।

परंपरा भी है, उत्सव भी है।

लेकिन इन दिनों एक सवाल फिर चर्चा में है—

गरबा आखिर है क्या?

सिर्फ डांस?

सिर्फ entertainment?

एक cultural event?

या फिर माँ शक्ति की आराधना से जुड़ा धार्मिक आयोजन?

छत्तीसगढ़ में इसी सवाल ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया है। राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने मुस्लिम युवाओं से गरबा में शामिल होने के संदर्भ में धार्मिक परंपराओं और आयोजन समिति की अनुमति का सम्मान करने की अपील की है। इस पर BJP ने उनका समर्थन किया, जबकि विपक्ष की ओर से इस पर सवाल उठाए गए। The Times of India

अब मेरी अपनी सोच सुनिए।


मेरे लिए गरबा सिर्फ डांस नहीं है

मैं सनातनी हिंदू हूँ।

इसलिए मेरे लिए नवरात्रि कोई “नौ दिन का event” नहीं है।

यह माँ शक्ति की उपासना है।

हमारे घर में माँ दुर्गा के सामने दीपक जलता है।

आरती होती है।

उपवास रखा जाता है।

मंदिर जाते हैं।

और जब गरबा होता है, तो उसके पीछे भी एक धार्मिक और सांस्कृतिक भाव होता है।

हाँ, आज के समय में बहुत से गरबा आयोजन बड़े commercial और entertainment events भी बन गए हैं।

यह वास्तविकता है।

लेकिन इससे गरबा की जड़ें नहीं बदल जातीं।

जिस परंपरा की जड़ धर्म में हो, उसकी मर्यादा को समझना भी जरूरी है।


अब सवाल आता है—कौन गरबा खेल सकता है?

यहीं बात थोड़ी संवेदनशील हो जाती है।

मेरी राय में इसका उत्तर केवल “हिंदू” या “मुस्लिम” में ढूँढना सही नहीं होगा।

पहला सवाल होना चाहिए—

आयोजन का स्वरूप क्या है?

अगर कोई कार्यक्रम खुले तौर पर एक commercial dance event है, तो उसके rules आयोजक तय करेंगे।

लेकिन अगर कोई आयोजन धार्मिक अनुष्ठान के रूप में हो रहा है, जहाँ माँ की पूजा, आरती और धार्मिक परंपराएँ उसका हिस्सा हैं, तो वहाँ आने वाले हर व्यक्ति से उस आयोजन की मर्यादा और नियमों का सम्मान अपेक्षित होना स्वाभाविक है।

यह बात सिर्फ गरबा पर लागू नहीं होती।

आप किसी भी धर्मस्थल में जाइए।

मंदिर है तो मंदिर की मर्यादा होगी।

गुरुद्वारा है तो उसकी मर्यादा होगी।

मस्जिद है तो उसकी अपनी मर्यादा होगी।

चर्च है तो उसकी अपनी परंपराएँ होंगी।

**सम्मान का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी पहचान छोड़ दें।

सम्मान का अर्थ है—दूसरे की आस्था का मजाक न बनाएं।**


लेकिन क्या मुसलमान गरबा देख भी नहीं सकता?

यहाँ मैं थोड़ी स्पष्ट बात कहना चाहूँगा।

किसी व्यक्ति को किसी दूसरे धर्म की संस्कृति को देखना, समझना या उसमें रुचि लेना अपने आप में कोई अपराध नहीं है।

भारत की खूबसूरती ही यही है कि यहाँ लोग एक-दूसरे के त्योहार देखते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं।

लेकिन भागीदारी और दर्शक होने में फर्क है।

और धार्मिक भागीदारी तथा केवल मनोरंजन में भी फर्क है।

मुझे लगता है कि इस अंतर को समझे बिना हम हर मुद्दे को “सांप्रदायिक” बनाकर बहस खत्म कर देते हैं।


सनातन किसी के खिलाफ नहीं है—लेकिन अपनी मर्यादा के पक्ष में जरूर है

यह बात मैं बहुत मजबूती से कहना चाहता हूँ।

मैं हिंदू हूँ।

मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है।

मुझे माँ दुर्गा पर आस्था है।

मुझे मंदिरों पर गर्व है।

मुझे भगवा ध्वज देखकर अच्छा लगता है।

मुझे “जय श्री राम” और “हर हर महादेव” बोलने में गर्व महसूस होता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से नफरत करता हूँ।

अपनी पहचान पर गर्व करने के लिए दूसरे की पहचान से नफरत करना जरूरी नहीं है।

बल्कि असली आत्मविश्वास तो तब है जब हम अपनी परंपरा को इतने विश्वास से जीएँ कि हमें अपनी पहचान छिपाने या उससे शर्माने की जरूरत ही न पड़े।


मुझे एक बात से परेशानी होती है…

आजकल त्योहार भी सोशल मीडिया content बन गए हैं।

नवरात्रि आई—

Reel बनाओ।

गरबा हुआ—

Video बनाओ।

मंदिर गए—

Selfie डालो।

आरती हुई—

Story लगाओ।

इसमें कुछ गलत नहीं है।

Technology और social media हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं।

लेकिन कभी-कभी मैं सोचता हूँ—

हम त्योहार मना रहे हैं या सिर्फ त्योहार की content creation कर रहे हैं?

क्या हमें पता भी है कि हम किसकी आराधना कर रहे हैं?

क्यों नवरात्रि नौ दिन की है?

माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूप क्या हैं?

गरबा का धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ क्या है?

हमारे बच्चों को यह पता है?

या उन्हें केवल इतना पता है कि—

“आज गरबा night है!”


और अब राजनीति भी इसमें आ गई

जैसे ही धर्म और सार्वजनिक आयोजन की बात आती है, राजनीति पीछे कैसे रह सकती है?

छत्तीसगढ़ में इस मुद्दे पर वक्फ बोर्ड के बयान के बाद BJP और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। The Times of India

मैं BJP के राजनीतिक विचारों के काफी करीब हूँ।

यह बात मैं छिपाता नहीं।

मुझे भारत की सांस्कृतिक पहचान पर गर्व है।

मैं चाहता हूँ कि हिंदू अपनी आस्था को लेकर defensive न रहें।

लेकिन एक बात BJP सहित हर राजनीतिक दल से कहूँगा—

धर्म को राजनीति में लाने से पहले धर्म की मर्यादा समझिए।

और विपक्ष से भी मेरा यही सवाल है—

हर धार्मिक sensitivity की बात को “नफरत” या “ध्रुवीकरण” कह देना भी उचित नहीं है।

कभी-कभी किसी समुदाय से अपनी धार्मिक मर्यादा का सम्मान करने की अपेक्षा करना भी एक legitimate social discussion हो सकता है।


हिंदुत्व का अर्थ मेरे लिए क्या है?

मेरे लिए हिंदुत्व का अर्थ यह नहीं है कि—

“कौन हमारे साथ है और कौन हमारे खिलाफ?”

मेरे लिए हिंदुत्व का अर्थ है—

आस्था।
आत्मसम्मान।
संस्कार।
मर्यादा।
कर्तव्य।
सत्य।
सेवा।

अगर कोई हमारे मंदिर में आता है और श्रद्धा से सिर झुकाता है, तो मैं उसका सम्मान करूँगा।

लेकिन अगर कोई धार्मिक आयोजन में आता है और उस धर्म का मजाक उड़ाता है, नियम तोड़ता है या माहौल खराब करता है, तो उसका विरोध भी होना चाहिए।

और यही नियम हर धर्म के लिए समान होना चाहिए।


हमें नियम बनाइए, दुश्मन नहीं

यही शायद इस पूरे विवाद की सबसे जरूरी बात है।

किसी आयोजन के आयोजकों को चाहिए कि वे पहले से स्पष्ट नियम बनाएँ।

Entry rules क्या हैं?

Religious rituals में participation कैसे होगा?

Security कैसे होगी?

Dress code है या नहीं?

Identity verification की जरूरत है या नहीं?

और अगर कोई नियम तोड़ता है तो कार्रवाई क्या होगी?

Rules पहले तय कीजिए।

फिर उन्हीं rules को सब पर समान रूप से लागू कीजिए।

समस्या तब पैदा होती है जब rules अस्पष्ट हों और बाद में हर चीज़ का फैसला पहचान देखकर होने लगे।


सनातन की ताकत क्या है?

मेरे विचार से सनातन की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशालता है।

हमारे यहाँ शास्त्रों में प्रश्न पूछने की परंपरा है।

विचार करने की परंपरा है।

संवाद की परंपरा है।

लेकिन इसका अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है।

आज हमें शायद दो चीज़ें एक साथ करनी होंगी—

अपनी संस्कृति पर गर्व भी और उसके अर्थ की समझ भी।

सिर्फ भगवा पहन लेने से संस्कृति नहीं बचती।

सिर्फ नारे लगाने से संस्कृति नहीं बचती।

और सिर्फ किसी दूसरे को रोक देने से भी संस्कृति नहीं बचती।

संस्कृति तब बचती है जब अगली पीढ़ी उसे समझती है, अपनाती है और सम्मान से जीती है।


मेरे लिए असली गरबा यही है

जब माँ की आरती हो और घर का बच्चा पूछे—

“माँ कौन हैं?”

जब पिता बच्चे को बताए—

“ये सिर्फ dance नहीं है, इसके पीछे हमारी परंपरा है।”

जब युवा modern भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ा भी हो।

जब हम दूसरे धर्म की इज्जत करें लेकिन अपनी आस्था को लेकर शर्मिंदा न हों।

जब राजनीति हो तो मुद्दों पर हो।

जब बहस हो तो तथ्यों पर हो।

और जब धर्म की बात हो—

तो सबसे पहले श्रद्धा और मर्यादा की बात हो।


अंत में मेरी एक छोटी-सी बात

मुझे नहीं लगता कि हर गरबा controversy का समाधान “किसे बाहर निकालना है” में है।

मुझे लगता है कि समाधान है—

यह तय करना कि गरबा है क्या।

अगर यह धार्मिक आयोजन है—

तो उसकी धार्मिक मर्यादा रहे।

अगर यह public cultural event है—

तो स्पष्ट और समान rules हों।

और अगर कोई व्यक्ति शामिल हो—

तो वह आयोजकों के नियमों और उस स्थान की आस्था का सम्मान करे।

बस।

इतना तो होना ही चाहिए।

क्योंकि—

अपनी संस्कृति की रक्षा का सबसे पहला कदम है—उसे खुद समझना।

और दूसरा—

उस पर गर्व करना।

तीसरा—

उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना।

बाकी राजनीति तो आती-जाती रहेगी।

सरकारें बदलेंगी।

नेता बदलेंगे।

बयान बदलेंगे।

लेकिन—

माँ शक्ति की आराधना, हमारी संस्कृति और हमारी सनातन चेतना…

यह हमसे बहुत बड़ी है।

🙏 जय माता दी।
🚩 जय श्री राम।
🔱 हर हर महादेव।
🇮🇳 भारत माता की जय।

— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
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Wednesday, October 07, 2026

पितरों से क्या कहेंगे? हमने उन्हें संस्कार दिए या सिर्फ श्राद्ध?

आज, 7 अक्टूबर 2026, पितृपक्ष में द्वादशी श्राद्ध है और आज ही मघा श्राद्ध भी मनाया जा रहा है। पितृपक्ष 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। 

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…


आज पितृपक्ष का समय है।

सुबह से मन में पितरों का स्मरण है। घर में श्राद्ध, तर्पण, दान-पुण्य और परंपराओं की बातें हो रही हैं। हर परिवार अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार अपने पूर्वजों को याद कर रहा है।

और इसी बीच मेरे मन में एक सवाल आया—

अगर आज हमारे पितर सचमुच हमारे सामने बैठ जाएँ, तो हम उनसे क्या कहेंगे?

क्या हम उनसे कहेंगे—

“दादा जी, हमने आपके नाम पर श्राद्ध कर दिया।”

“पिताजी, हमने तर्पण भी कर दिया।”

“आपके लिए भोजन भी कराया।”

और फिर?

क्या इतना ही काफी है?

या वे हमसे यह भी पूछेंगे—

“बेटा, जो संस्कार हम तुम्हें देकर गए थे… उनका तुमने क्या किया?”

बस यहीं से बात थोड़ी गंभीर हो जाती है।


पितरों को सिर्फ जल नहीं, योग्य संतान चाहिए

हमारी परंपरा में पितृपक्ष केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति स्मरण, कृतज्ञता और पारिवारिक दायित्व का समय माना जाता है। आज के दिन मघा नक्षत्र और द्वादशी तिथि के कारण श्राद्ध की विशेष परंपराएँ भी जुड़ी हैं।

लेकिन मेरे मन की बात कुछ और है।

मुझे लगता है—

पितरों को केवल तर्पण का जल नहीं चाहिए।
उन्हें हमारी योग्यता चाहिए।
उन्हें हमारे संस्कार चाहिए।
उन्हें हमारे कर्म चाहिए।

हमने अपने बच्चों को क्या दिया?

महंगा स्कूल दिया।

अच्छा मोबाइल दिया।

Laptop दिया।

Career की चिंता की।

Competitive दुनिया के लिए तैयार किया।

लेकिन क्या हमने उसे यह भी सिखाया कि—

माता-पिता का सम्मान क्या होता है?

बड़ों के सामने कैसे बैठते हैं?

अन्न की कदर क्या होती है?

अपने धर्म और संस्कृति का अर्थ क्या है?

अपने देश के प्रति जिम्मेदारी क्या है?

और सबसे बड़ी बात—

चरित्र क्या होता है?


हम बच्चों को सब कुछ दे रहे हैं… बस अपनी जड़ें नहीं

आज की पीढ़ी पर मेरा कोई गुस्सा नहीं है।

आखिर बच्चे वही सीखते हैं जो हम उन्हें सिखाते हैं।

हम खुद दिनभर mobile में लगे रहते हैं और बच्चों से कहते हैं—

“फोन कम चलाओ।”

हम खुद घर में त्योहार का मतलब Google से खोजते हैं और बच्चों से कहते हैं—

“हमारी संस्कृति बहुत महान है।”

हम खुद रामायण नहीं पढ़ते, और बच्चे से पूछते हैं—

“तुम्हें श्रीराम के बारे में कुछ पता है?”

हम खुद गीता का एक श्लोक याद नहीं रखते और बच्चे से कहते हैं—

“हमारी सनातन परंपरा दुनिया की सबसे महान परंपरा है।”

भाई साहब…

बच्चे भाषण से नहीं, उदाहरण से सीखते हैं।


Career बनाना जरूरी है, character बनाना उससे भी ज्यादा जरूरी

मैं finance और administration की दुनिया से जुड़ा हुआ आदमी हूँ।

नंबर समझता हूँ।

Accounts समझता हूँ।

Tax समझता हूँ।

Balance Sheet समझता हूँ।

लेकिन जिंदगी की असली Balance Sheet शायद कुछ और होती है।

आपकी कमाई कितनी है, यह एक column है।

आपके पास कितनी property है, दूसरा column है।

आपके पास कितनी गाड़ियाँ हैं, तीसरा column है।

लेकिन आखिर में कुछ सवाल ऐसे हैं जिन्हें कोई CA आपकी Balance Sheet में नहीं लिख सकता।

आपने कितने लोगों का भला किया?

आपने अपने माता-पिता को कितना सम्मान दिया?

आपने अपने बच्चों को क्या संस्कार दिए?

आपने समाज को क्या दिया?

और जब आप नहीं रहेंगे, तो लोग आपको किस रूप में याद करेंगे?

यही तो असली हिसाब है।


सनातन सिर्फ पूजा का नाम नहीं है

मैं सनातनी हूँ।

इसमें मुझे कोई संकोच नहीं है।

मुझे मंदिर पसंद हैं।

मुझे आरती पसंद है।

मुझे घंटियों की आवाज पसंद है।

मुझे “हर हर महादेव” सुनना अच्छा लगता है।

मुझे “जय श्री राम” कहना अच्छा लगता है।

मुझे भगवा देखकर गर्व होता है।

लेकिन मेरे लिए सनातन केवल इन चीज़ों का नाम नहीं है।

सनातन का अर्थ मेरे लिए है—

सत्य।
कर्तव्य।
मर्यादा।
संयम।
सेवा।
परिवार।
समाज।
राष्ट्र।

अगर मैं मंदिर जाकर भगवान के सामने सिर झुका दूँ, लेकिन बाहर निकलकर किसी गरीब को देखकर मुंह फेर लूँ—

तो मेरे माथे का तिलक मुझे बड़ा सनातनी नहीं बना देता।

अगर मैं “जय श्री राम” जोर से बोलूँ, लेकिन अपने घर के बुजुर्गों से ऊँची आवाज में बात करूँ—

तो समस्या भगवान में नहीं है।

समस्या मेरे आचरण में है।


राम को मानते हैं तो राम को समझिए भी

हम श्रीराम को भगवान मानते हैं।

बहुत अच्छी बात है।

लेकिन श्रीराम के जीवन से हमने क्या सीखा?

क्या सिर्फ उनका नाम लेना है?

या उनकी मर्यादा भी समझनी है?

आज राजनीति में पक्ष और विपक्ष में बहस होती है।

होनी चाहिए।

लोकतंत्र है, विचार अलग होंगे।

लेकिन क्या हर असहमति दुश्मनी बन जाए?

क्या सामने वाला गलत विचार रखता है तो वह देशद्रोही हो गया?

क्या अपनी पार्टी का समर्थन करने का मतलब यह है कि उसकी हर बात सही है?

मुझे ऐसा नहीं लगता।

भक्ति भगवान के प्रति हो सकती है।
राजनीति में विवेक होना चाहिए।


हाँ, मैं BJP के करीब हूँ

मैं यह बात छिपाकर क्यों रखूँ?

मेरी राजनीतिक सोच काफी हद तक BJP के राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के करीब है।

मैं चाहता हूँ कि भारत अपनी सभ्यता पर गर्व करे।

मैं चाहता हूँ कि सनातन संस्कृति को हीन भावना से न देखा जाए।

मैं चाहता हूँ कि हमारी ऐतिहासिक विरासत, मंदिर, परंपराएँ और भारतीय ज्ञान परंपरा को सम्मान मिले।

लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि मेरे लिए राजनीति भगवान बन जाए।

BJP भी इंसानों की पार्टी है।
उसके नेता भी इंसान हैं।
सरकार भी इंसानों द्वारा चलती है।

इसलिए समर्थन करूँगा तो अच्छे काम का।

सवाल होगा तो सवाल भी करूँगा।

किसी निर्णय से सहमत हूँ तो खुलकर कहूँगा।

गलत लगेगा तो गलत भी कहूँगा।

क्योंकि—

**देश किसी पार्टी से बड़ा है।

सनातन किसी पार्टी से बहुत बड़ा है।**


हमारे पितर आज होते तो शायद हमसे क्या पूछते?

मैं कभी-कभी कल्पना करता हूँ।

मेरे दादा या उनसे पहले की पीढ़ियाँ अगर आज हमारे सामने बैठ जाएँ तो शायद वे हमसे यह नहीं पूछेंगी कि—

“तुम्हारे पास कौन सा smartphone है?”

वे यह नहीं पूछेंगी—

“तुम Instagram पर कितने followers रखते हो?”

उन्हें शायद यह भी फर्क नहीं पड़ेगा कि आपकी car कौन सी है।

वे शायद पूछें—

“परिवार जुड़ा हुआ है?”

“बच्चे संस्कारी हैं?”

“घर में बड़ों की इज्जत होती है?”

“तुम अपने धर्म को समझते हो?”

“तुम अपने देश के लिए क्या करते हो?”

“तुम ईमानदारी से कमाते हो?”

और शायद सबसे आखिरी सवाल—

“जो भारत हमने तुम्हें दिया था, उसे तुम अगली पीढ़ी को किस हालत में सौंपोगे?”

इस सवाल का जवाब मेरे पास भी पूरी तरह तैयार नहीं है।

आपके पास है?


देशभक्ति सिर्फ झंडा लगाने से नहीं होती

15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा लगाइए।

राष्ट्रगान पर खड़े होइए।

“भारत माता की जय” बोलिए।

बिल्कुल बोलिए।

लेकिन देशभक्ति की असली परीक्षा शायद उस दिन होती है जब—

आपको रिश्वत देने का मौका मिले और आप मना कर दें।

आपके सामने सरकारी नियम हो और आप उसे “जुगाड़” से तोड़ने की कोशिश न करें।

आपका कर्मचारी कमजोर हो और आप उसका हक न मारें।

आप business में फायदा उठा सकते हों लेकिन सामने वाले को धोखा न दें।

आपके पास कूड़ा हो और आप उसे सड़क पर न फेंकें।

आप tax बचाने के लिए गलत रास्ता अपना सकते हों और फिर भी सही रास्ता चुनें।

यही राष्ट्रधर्म है।


धर्म घर से शुरू होता है

हम कहते हैं—

“समाज बदलना चाहिए।”

“देश बदलना चाहिए।”

“राजनीति बदलनी चाहिए।”

“युवाओं को बदलना चाहिए।”

लेकिन शायद हमें शुरुआत एक बहुत छोटी जगह से करनी चाहिए—

अपने घर से।

घर में रोज भगवान का दीपक जलता हो, अच्छी बात है।

लेकिन घर में प्रेम भी जलता रहे।

बच्चे संस्कृत मंत्र बोलें, अच्छी बात है।

लेकिन वे सच बोलना भी सीखें।

बच्चे मंदिर जाएँ, अच्छी बात है।

लेकिन वे सड़क पर किसी जरूरतमंद की मदद भी करें।

बच्चे भारत माता की जय बोलें, अच्छी बात है।

लेकिन वे भारत के प्रति अपना कर्तव्य भी समझें।


पितृपक्ष का सबसे बड़ा सबक

पितृपक्ष हमें पीछे देखने के लिए मजबूर करता है।

लेकिन शायद उसका असली उद्देश्य सिर्फ पीछे देखना नहीं है।

यह आगे देखने का भी समय है।

हमसे पहले कौन थे?

उन्होंने क्या संघर्ष किया?

उन्होंने हमें क्या दिया?

और अब हमारी बारी है।

हम अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ेंगे?

Property?

Money?

Jewellery?

Business?

Bank Balance?

ठीक है।

लेकिन इनके साथ—

संस्कार भी छोड़िए।

सत्य की आदत भी छोड़िए।

अपनी संस्कृति की समझ भी छोड़िए।

देश के प्रति प्रेम भी छोड़िए।

और सबसे बढ़कर—एक अच्छा इंसान छोड़िए।


आखिर में…

आज पितरों को याद करते हुए मैं अपने आप से एक सवाल पूछ रहा हूँ—

क्या मैं अपने पितरों का योग्य वंशज हूँ?

यह सवाल शायद हर व्यक्ति को खुद से पूछना चाहिए।

क्योंकि श्राद्ध की थाली कुछ घंटों में समाप्त हो जाती है।

तर्पण का जल नदी में मिल जाता है।

दीपक कुछ समय बाद बुझ जाता है।

लेकिन…

हमारे कर्म की विरासत आगे चलती रहती है।

इसलिए अगली बार जब आप अपने पितरों के लिए जल अर्पित करें, तो एक छोटा सा संकल्प भी करिए—

मैं अपने घर को जोड़कर रखूँगा।
मैं अपने बच्चों को संस्कार दूँगा।
मैं अपनी संस्कृति को समझूँगा।
मैं अपने धर्म का सम्मान करूँगा।
मैं अपने देश के प्रति ईमानदार रहूँगा।
और कोशिश करूँगा कि मेरे बाद आने वाली पीढ़ी कह सके—

“हमारे पूर्वजों ने हमें सिर्फ संपत्ति नहीं, एक विरासत दी थी।”

शायद…

पितरों के लिए इससे बड़ी श्रद्धांजलि कोई नहीं।

🙏 ॐ पितृभ्यो नमः।
🚩 जय श्री राम।
🔱 हर हर महादेव।
🇮🇳 भारत माता की जय।

— देव वैदिक
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