मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
जय माता दी! 🙏🚩
नवरात्रि आने वाली है।
बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। कहीं माता रानी के दरबार सज रहे हैं, कहीं पंडालों की तैयारी चल रही है, तो कहीं गरबा और डांडिया की योजनाएँ बन रही हैं। घरों में पूजा की सामग्री जुटाई जा रही है। सोशल मीडिया पर भी जल्द ही माँ दुर्गा की तस्वीरें, भक्ति गीत और जयकारे दिखाई देने लगेंगे।
अच्छा लगता है यह सब देखकर।
मन में श्रद्धा जागती है। अपनी संस्कृति पर गर्व होता है। लगता है कि हमारी परंपराएँ आज भी जीवित हैं।
लेकिन इसी बीच मेरे मन में एक सवाल आया।
हम माँ दुर्गा की पूजा तो बड़े उत्साह से करते हैं, लेकिन क्या हम अपने जीवन में स्त्री का सम्मान भी उसी श्रद्धा से करते हैं?
सवाल थोड़ा असहज है, लेकिन मुझे लगता है कि इस पर बात होनी चाहिए।
क्योंकि धर्म का अर्थ केवल वह नहीं है जो हम मंदिर में करते हैं। धर्म का संबंध उस व्यवहार से भी है, जो हम मंदिर से बाहर निकलने के बाद करते हैं।
और आज मैं इसी विषय पर अपनी बात रखना चाहता हूँ।
माँ दुर्गा की आराधना और हमारी जिम्मेदारी
सनातन परंपरा में शक्ति की उपासना का विशेष स्थान है।
हम माँ दुर्गा को शक्ति का स्वरूप मानते हैं। माँ लक्ष्मी को समृद्धि और माँ सरस्वती को ज्ञान की देवी के रूप में पूजते हैं।
हमारे यहाँ स्त्री के विभिन्न स्वरूपों को देवी से जोड़कर देखा जाता है।
यह हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लेकिन मेरे मन में सवाल उठता है कि जब हमारी परंपरा स्त्री को इतना सम्मान देती है, तो उस सम्मान की झलक हमारे रोजमर्रा के जीवन में कितनी दिखाई देती है?
मंदिर में माँ के सामने सिर झुकाना आसान है।
लेकिन घर की माँ की बात धैर्य से सुनना भी जरूरी है।
माँ दुर्गा की आरती करना अच्छी बात है।
लेकिन अपनी पत्नी के सपनों और इच्छाओं को महत्व देना भी जरूरी है।
कन्या पूजन करना श्रद्धा का विषय है।
लेकिन अपनी बेटी को बिना डर के आगे बढ़ने का अवसर देना भी उतना ही जरूरी है।
और बहन को देवी कहकर संबोधित करना तभी सार्थक लगता है, जब उसकी स्वतंत्रता, निर्णय और सम्मान का भी आदर किया जाए।
यही वह जगह है, जहाँ हमारी आस्था और हमारा आचरण एक-दूसरे से मिलते हैं।
असली सवाल लड़कियों से नहीं, लड़कों की परवरिश से भी पूछिए
हम अक्सर बेटियों को समझाते हैं।
ध्यान से रहना।
देर तक बाहर मत रहना।
किसी अनजान व्यक्ति पर भरोसा मत करना।
अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना।
इन बातों का अपना महत्व है। सावधानी जरूरी है।
लेकिन क्या हम अपने बेटों को भी उतनी गंभीरता से समझाते हैं?
क्या हम उन्हें सिखाते हैं कि किसी महिला से बातचीत कैसे करनी चाहिए?
क्या हम उन्हें बताते हैं कि किसी की असहमति का सम्मान करना क्या होता है?
क्या हम समझाते हैं कि किसी लड़की का आधुनिक कपड़े पहनना, अकेले घूमना या अपनी पसंद का जीवन चुनना किसी को उसके चरित्र पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं देता?
और सबसे महत्वपूर्ण बात—
क्या हम अपने बेटों को यह सिखाते हैं कि सम्मान कोई एहसान नहीं, बल्कि हर इंसान का अधिकार है?
मेरी राय में, अच्छी परवरिश का अर्थ केवल अपने बच्चे को सफल बनाना नहीं है।
उसे ऐसा इंसान बनाना भी है, जिसके व्यवहार से दूसरे लोग सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें।
बेटियों को मजबूत बनाइए, बिल्कुल बनाइए।
लेकिन बेटों को जिम्मेदार बनाना भी मत भूलिए।
समाज तभी बेहतर होगा, जब जिम्मेदारी दोनों तरफ समझी जाएगी।
सनातन केवल पहचान नहीं, आचरण भी है
मैं अपनी सनातन पहचान पर गर्व करता हूँ।
मुझे मंदिरों से लगाव है। मुझे भारतीय त्योहार अच्छे लगते हैं। मुझे अपनी संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ाव महसूस होता है।
मैं चाहता हूँ कि हमारी अगली पीढ़ी भी अपनी जड़ों को समझे और उन पर गर्व करे।
लेकिन मेरे लिए सनातन का अर्थ केवल धार्मिक प्रतीकों तक सीमित नहीं है।
मेरे लिए इसका संबंध सत्य, कर्तव्य, मर्यादा, करुणा और आत्मसंयम जैसे मूल्यों से भी है।
अगर माथे पर तिलक है, तो व्यवहार में विनम्रता भी होनी चाहिए।
अगर जुबान पर भगवान का नाम है, तो शब्दों में मर्यादा भी होनी चाहिए।
अगर हम धर्म की रक्षा की बात करते हैं, तो अपने आचरण की कमियों को सुधारने का साहस भी होना चाहिए।
किसी को सनातनी कहलाने से पहले अपनी आस्था का प्रमाण नहीं देना चाहिए, लेकिन अपने आचरण में उसके मूल्यों को उतारने का प्रयास जरूर करना चाहिए।
और यह बात केवल हिंदुओं के लिए नहीं है। हर धर्म और हर समाज में अपने मूल्यों को व्यवहार में उतारने की जिम्मेदारी होती है।
राजनीति अपनी जगह, सामाजिक जिम्मेदारी अपनी जगह
अब कोई यह भी पूछ सकता है कि क्या महिलाओं के सम्मान पर बात करना केवल सामाजिक विषय है या राजनीतिक भी?
मेरे विचार से यह दोनों है।
सरकार की जिम्मेदारी है कि कानून-व्यवस्था मजबूत हो, महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की निष्पक्ष जाँच हो, दोषियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो और पीड़ितों को न्याय मिले।
परिवार की जिम्मेदारी है कि बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित हों।
समाज की जिम्मेदारी है कि गलत व्यवहार को सामान्य मानकर नजरअंदाज न किया जाए।
और व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह खुद अपने आचरण पर ध्यान दे।
मैं राजनीतिक रूप से BJP के राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के काफी करीब हूँ। अपनी विचारधारा को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं है।
लेकिन मेरी दृष्टि में भारतीय संस्कृति का सम्मान केवल भाषणों से नहीं होगा। इसके लिए हमें अपने समाज की वास्तविक समस्याओं पर भी गंभीरता से काम करना होगा।
महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक अवसर और न्याय तक उनकी पहुँच ऐसे विषय हैं, जिन पर सरकार, प्रशासन, परिवार और समाज—सभी की भूमिका है।
राजनीति में किसी विचारधारा का समर्थन करना अपनी जगह है, लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी किसी पार्टी की सीमा में बँधी हुई नहीं होती।
जो बात सही है, उसका समर्थन होना चाहिए। जो समस्या वास्तविक है, उसका समाधान भी होना चाहिए।
सोशल मीडिया पर देवी, व्यवहार में क्या?
आज सोशल मीडिया के जमाने में भक्ति दिखाना पहले से कहीं आसान हो गया है।
माँ दुर्गा की तस्वीर लगाइए।
भजन साझा कीजिए।
जय माता दी लिखिए।
मंदिर की सुंदर तस्वीर पोस्ट कीजिए।
इसमें कोई बुराई नहीं है। भक्ति व्यक्त करने के अनेक तरीके हो सकते हैं।
लेकिन एक छोटा-सा सवाल अपने आप से भी पूछिए।
जब घर में माँ कुछ कहती हैं, तो क्या हम उनकी बात सुनते हैं?
जब पत्नी असहमत होती है, तो क्या हम उसकी राय का सम्मान करते हैं?
जब किसी महिला सहकर्मी को काम में सफलता मिलती है, तो क्या हम उसकी मेहनत को स्वीकार करते हैं?
जब सड़क पर किसी महिला के साथ अनुचित व्यवहार होता है, तो क्या हम कम-से-कम उचित और सुरक्षित तरीके से मदद करने की कोशिश करते हैं?
या फिर हमारी सारी सक्रियता सोशल मीडिया के पोस्ट तक ही सीमित रह जाती है?
भक्ति की तस्वीर पोस्ट करना आसान है। अपने व्यवहार से सम्मान प्रदर्शित करना ज्यादा कठिन, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मेरे हिसाब से यही आत्मचिंतन नवरात्रि को और सार्थक बना सकता है।
माँ दुर्गा से शक्ति माँगिए, लेकिन अपने भीतर भी बदलाव लाइए
नवरात्रि में हम माँ से शक्ति माँगते हैं।
संकटों से लड़ने की शक्ति।
गलत के सामने खड़े होने की शक्ति।
परिवार को संभालने की शक्ति।
जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति।
लेकिन क्या हम अपने भीतर की कमियों से लड़ने की शक्ति भी माँगते हैं?
क्रोध पर नियंत्रण रखने की शक्ति।
दूसरे की बात सुनने की शक्ति।
अपनी गलती स्वीकार करने की शक्ति।
अहंकार छोड़ने की शक्ति।
और जरूरत पड़ने पर अपने ही गलत व्यवहार को बदलने की शक्ति।
मुझे लगता है कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
क्योंकि शक्ति का अर्थ केवल दूसरों पर प्रभाव जमाना नहीं है।
कभी-कभी असली शक्ति अपने भीतर झाँककर खुद को सुधारने में होती है।
माँ दुर्गा की आराधना करते हुए अगर हम थोड़ा अधिक संवेदनशील, थोड़ा अधिक न्यायप्रिय और थोड़ा अधिक जिम्मेदार इंसान बन सकें, तो यह भी हमारी साधना का एक सुंदर परिणाम होगा।
इस नवरात्रि एक छोटा-सा संकल्प लीजिए
इस बार माता रानी के सामने दीपक जलाते समय एक संकल्प अपने लिए भी रखिए।
हम अपने घर की महिलाओं को सम्मान देंगे।
बेटियों और बेटों—दोनों को जिम्मेदारी और समान गरिमा का महत्व सिखाएँगे।
किसी महिला के पहनावे, स्वतंत्रता या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर उसके चरित्र का फैसला नहीं करेंगे।
गलत व्यवहार का समर्थन केवल इसलिए नहीं करेंगे कि गलती करने वाला हमारा परिचित है।
और जहाँ संभव हो, अपने परिवार और समाज में ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करेंगे जहाँ महिलाएँ अपनी बात बिना अनावश्यक भय के रख सकें।
यह कोई बहुत बड़ी या असंभव सूची नहीं है।
शुरुआत हमारे अपने व्यवहार से हो सकती है।
और बदलाव की शुरुआत अक्सर वहीं से होती है।
अंत में, मेरी बात बस इतनी-सी है…
नवरात्रि में माँ दुर्गा की पूजा जरूर कीजिए।
मंदिर जाइए।
आरती कीजिए।
व्रत रखिए, अपनी परंपरा के अनुसार उत्सव मनाइए।
गरबा खेलिए, डांडिया कीजिए और परिवार के साथ खुशियाँ बाँटिए।
लेकिन इन सबके बीच उस मूल भावना को भी याद रखिए, जिसके साथ हम माँ शक्ति की आराधना करते हैं।
जिस समाज में देवी की पूजा होती है, उस समाज को स्त्री के सम्मान के लिए भी उतना ही गंभीर होना चाहिए।
और सम्मान का अर्थ केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है।
सम्मान का अर्थ है—उसकी बात सुनना, उसके निर्णयों का आदर करना, उसके अवसरों को सीमित न करना और उसे एक स्वतंत्र, समान अधिकारों वाले इंसान के रूप में स्वीकार करना।
मेरे लिए सनातन का गौरव केवल हमारी प्राचीन परंपराओं में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए उनसे क्या सीखते हैं।
इसलिए इस नवरात्रि मैं अपने आप से यही सवाल पूछना चाहता हूँ—
मैं माँ दुर्गा की पूजा तो करता हूँ, लेकिन क्या मैं उनके नाम से जुड़े शक्ति और सम्मान के संदेश को अपने व्यवहार में भी उतार रहा हूँ?
इस सवाल का जवाब हर व्यक्ति को स्वयं खोजना है।
क्योंकि धर्म केवल कहने की चीज नहीं है। वह हमारे कर्मों में भी दिखाई देना चाहिए।
🙏 जय माता दी!
🚩 जय श्री राम!
🔱 हर हर महादेव!
— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
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