आज, 7 अक्टूबर 2026, पितृपक्ष में द्वादशी श्राद्ध है और आज ही मघा श्राद्ध भी मनाया जा रहा है। पितृपक्ष 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा।
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
आज पितृपक्ष का समय है।
सुबह से मन में पितरों का स्मरण है। घर में श्राद्ध, तर्पण, दान-पुण्य और परंपराओं की बातें हो रही हैं। हर परिवार अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार अपने पूर्वजों को याद कर रहा है।
और इसी बीच मेरे मन में एक सवाल आया—
अगर आज हमारे पितर सचमुच हमारे सामने बैठ जाएँ, तो हम उनसे क्या कहेंगे?
क्या हम उनसे कहेंगे—
“दादा जी, हमने आपके नाम पर श्राद्ध कर दिया।”
“पिताजी, हमने तर्पण भी कर दिया।”
“आपके लिए भोजन भी कराया।”
और फिर?
क्या इतना ही काफी है?
या वे हमसे यह भी पूछेंगे—
“बेटा, जो संस्कार हम तुम्हें देकर गए थे… उनका तुमने क्या किया?”
बस यहीं से बात थोड़ी गंभीर हो जाती है।
पितरों को सिर्फ जल नहीं, योग्य संतान चाहिए
हमारी परंपरा में पितृपक्ष केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति स्मरण, कृतज्ञता और पारिवारिक दायित्व का समय माना जाता है। आज के दिन मघा नक्षत्र और द्वादशी तिथि के कारण श्राद्ध की विशेष परंपराएँ भी जुड़ी हैं।
लेकिन मेरे मन की बात कुछ और है।
मुझे लगता है—
पितरों को केवल तर्पण का जल नहीं चाहिए।
उन्हें हमारी योग्यता चाहिए।
उन्हें हमारे संस्कार चाहिए।
उन्हें हमारे कर्म चाहिए।
हमने अपने बच्चों को क्या दिया?
महंगा स्कूल दिया।
अच्छा मोबाइल दिया।
Laptop दिया।
Career की चिंता की।
Competitive दुनिया के लिए तैयार किया।
लेकिन क्या हमने उसे यह भी सिखाया कि—
माता-पिता का सम्मान क्या होता है?
बड़ों के सामने कैसे बैठते हैं?
अन्न की कदर क्या होती है?
अपने धर्म और संस्कृति का अर्थ क्या है?
अपने देश के प्रति जिम्मेदारी क्या है?
और सबसे बड़ी बात—
चरित्र क्या होता है?
हम बच्चों को सब कुछ दे रहे हैं… बस अपनी जड़ें नहीं
आज की पीढ़ी पर मेरा कोई गुस्सा नहीं है।
आखिर बच्चे वही सीखते हैं जो हम उन्हें सिखाते हैं।
हम खुद दिनभर mobile में लगे रहते हैं और बच्चों से कहते हैं—
“फोन कम चलाओ।”
हम खुद घर में त्योहार का मतलब Google से खोजते हैं और बच्चों से कहते हैं—
“हमारी संस्कृति बहुत महान है।”
हम खुद रामायण नहीं पढ़ते, और बच्चे से पूछते हैं—
“तुम्हें श्रीराम के बारे में कुछ पता है?”
हम खुद गीता का एक श्लोक याद नहीं रखते और बच्चे से कहते हैं—
“हमारी सनातन परंपरा दुनिया की सबसे महान परंपरा है।”
भाई साहब…
बच्चे भाषण से नहीं, उदाहरण से सीखते हैं।
Career बनाना जरूरी है, character बनाना उससे भी ज्यादा जरूरी
मैं finance और administration की दुनिया से जुड़ा हुआ आदमी हूँ।
नंबर समझता हूँ।
Accounts समझता हूँ।
Tax समझता हूँ।
Balance Sheet समझता हूँ।
लेकिन जिंदगी की असली Balance Sheet शायद कुछ और होती है।
आपकी कमाई कितनी है, यह एक column है।
आपके पास कितनी property है, दूसरा column है।
आपके पास कितनी गाड़ियाँ हैं, तीसरा column है।
लेकिन आखिर में कुछ सवाल ऐसे हैं जिन्हें कोई CA आपकी Balance Sheet में नहीं लिख सकता।
आपने कितने लोगों का भला किया?
आपने अपने माता-पिता को कितना सम्मान दिया?
आपने अपने बच्चों को क्या संस्कार दिए?
आपने समाज को क्या दिया?
और जब आप नहीं रहेंगे, तो लोग आपको किस रूप में याद करेंगे?
यही तो असली हिसाब है।
सनातन सिर्फ पूजा का नाम नहीं है
मैं सनातनी हूँ।
इसमें मुझे कोई संकोच नहीं है।
मुझे मंदिर पसंद हैं।
मुझे आरती पसंद है।
मुझे घंटियों की आवाज पसंद है।
मुझे “हर हर महादेव” सुनना अच्छा लगता है।
मुझे “जय श्री राम” कहना अच्छा लगता है।
मुझे भगवा देखकर गर्व होता है।
लेकिन मेरे लिए सनातन केवल इन चीज़ों का नाम नहीं है।
सनातन का अर्थ मेरे लिए है—
सत्य।
कर्तव्य।
मर्यादा।
संयम।
सेवा।
परिवार।
समाज।
राष्ट्र।
अगर मैं मंदिर जाकर भगवान के सामने सिर झुका दूँ, लेकिन बाहर निकलकर किसी गरीब को देखकर मुंह फेर लूँ—
तो मेरे माथे का तिलक मुझे बड़ा सनातनी नहीं बना देता।
अगर मैं “जय श्री राम” जोर से बोलूँ, लेकिन अपने घर के बुजुर्गों से ऊँची आवाज में बात करूँ—
तो समस्या भगवान में नहीं है।
समस्या मेरे आचरण में है।
राम को मानते हैं तो राम को समझिए भी
हम श्रीराम को भगवान मानते हैं।
बहुत अच्छी बात है।
लेकिन श्रीराम के जीवन से हमने क्या सीखा?
क्या सिर्फ उनका नाम लेना है?
या उनकी मर्यादा भी समझनी है?
आज राजनीति में पक्ष और विपक्ष में बहस होती है।
होनी चाहिए।
लोकतंत्र है, विचार अलग होंगे।
लेकिन क्या हर असहमति दुश्मनी बन जाए?
क्या सामने वाला गलत विचार रखता है तो वह देशद्रोही हो गया?
क्या अपनी पार्टी का समर्थन करने का मतलब यह है कि उसकी हर बात सही है?
मुझे ऐसा नहीं लगता।
भक्ति भगवान के प्रति हो सकती है।
राजनीति में विवेक होना चाहिए।
हाँ, मैं BJP के करीब हूँ
मैं यह बात छिपाकर क्यों रखूँ?
मेरी राजनीतिक सोच काफी हद तक BJP के राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के करीब है।
मैं चाहता हूँ कि भारत अपनी सभ्यता पर गर्व करे।
मैं चाहता हूँ कि सनातन संस्कृति को हीन भावना से न देखा जाए।
मैं चाहता हूँ कि हमारी ऐतिहासिक विरासत, मंदिर, परंपराएँ और भारतीय ज्ञान परंपरा को सम्मान मिले।
लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि मेरे लिए राजनीति भगवान बन जाए।
BJP भी इंसानों की पार्टी है।
उसके नेता भी इंसान हैं।
सरकार भी इंसानों द्वारा चलती है।
इसलिए समर्थन करूँगा तो अच्छे काम का।
सवाल होगा तो सवाल भी करूँगा।
किसी निर्णय से सहमत हूँ तो खुलकर कहूँगा।
गलत लगेगा तो गलत भी कहूँगा।
क्योंकि—
**देश किसी पार्टी से बड़ा है।
सनातन किसी पार्टी से बहुत बड़ा है।**
हमारे पितर आज होते तो शायद हमसे क्या पूछते?
मैं कभी-कभी कल्पना करता हूँ।
मेरे दादा या उनसे पहले की पीढ़ियाँ अगर आज हमारे सामने बैठ जाएँ तो शायद वे हमसे यह नहीं पूछेंगी कि—
“तुम्हारे पास कौन सा smartphone है?”
वे यह नहीं पूछेंगी—
“तुम Instagram पर कितने followers रखते हो?”
उन्हें शायद यह भी फर्क नहीं पड़ेगा कि आपकी car कौन सी है।
वे शायद पूछें—
“परिवार जुड़ा हुआ है?”
“बच्चे संस्कारी हैं?”
“घर में बड़ों की इज्जत होती है?”
“तुम अपने धर्म को समझते हो?”
“तुम अपने देश के लिए क्या करते हो?”
“तुम ईमानदारी से कमाते हो?”
और शायद सबसे आखिरी सवाल—
“जो भारत हमने तुम्हें दिया था, उसे तुम अगली पीढ़ी को किस हालत में सौंपोगे?”
इस सवाल का जवाब मेरे पास भी पूरी तरह तैयार नहीं है।
आपके पास है?
देशभक्ति सिर्फ झंडा लगाने से नहीं होती
15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा लगाइए।
राष्ट्रगान पर खड़े होइए।
“भारत माता की जय” बोलिए।
बिल्कुल बोलिए।
लेकिन देशभक्ति की असली परीक्षा शायद उस दिन होती है जब—
आपको रिश्वत देने का मौका मिले और आप मना कर दें।
आपके सामने सरकारी नियम हो और आप उसे “जुगाड़” से तोड़ने की कोशिश न करें।
आपका कर्मचारी कमजोर हो और आप उसका हक न मारें।
आप business में फायदा उठा सकते हों लेकिन सामने वाले को धोखा न दें।
आपके पास कूड़ा हो और आप उसे सड़क पर न फेंकें।
आप tax बचाने के लिए गलत रास्ता अपना सकते हों और फिर भी सही रास्ता चुनें।
यही राष्ट्रधर्म है।
धर्म घर से शुरू होता है
हम कहते हैं—
“समाज बदलना चाहिए।”
“देश बदलना चाहिए।”
“राजनीति बदलनी चाहिए।”
“युवाओं को बदलना चाहिए।”
लेकिन शायद हमें शुरुआत एक बहुत छोटी जगह से करनी चाहिए—
अपने घर से।
घर में रोज भगवान का दीपक जलता हो, अच्छी बात है।
लेकिन घर में प्रेम भी जलता रहे।
बच्चे संस्कृत मंत्र बोलें, अच्छी बात है।
लेकिन वे सच बोलना भी सीखें।
बच्चे मंदिर जाएँ, अच्छी बात है।
लेकिन वे सड़क पर किसी जरूरतमंद की मदद भी करें।
बच्चे भारत माता की जय बोलें, अच्छी बात है।
लेकिन वे भारत के प्रति अपना कर्तव्य भी समझें।
पितृपक्ष का सबसे बड़ा सबक
पितृपक्ष हमें पीछे देखने के लिए मजबूर करता है।
लेकिन शायद उसका असली उद्देश्य सिर्फ पीछे देखना नहीं है।
यह आगे देखने का भी समय है।
हमसे पहले कौन थे?
उन्होंने क्या संघर्ष किया?
उन्होंने हमें क्या दिया?
और अब हमारी बारी है।
हम अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ेंगे?
Property?
Money?
Jewellery?
Business?
Bank Balance?
ठीक है।
लेकिन इनके साथ—
संस्कार भी छोड़िए।
सत्य की आदत भी छोड़िए।
अपनी संस्कृति की समझ भी छोड़िए।
देश के प्रति प्रेम भी छोड़िए।
और सबसे बढ़कर—एक अच्छा इंसान छोड़िए।
आखिर में…
आज पितरों को याद करते हुए मैं अपने आप से एक सवाल पूछ रहा हूँ—
क्या मैं अपने पितरों का योग्य वंशज हूँ?
यह सवाल शायद हर व्यक्ति को खुद से पूछना चाहिए।
क्योंकि श्राद्ध की थाली कुछ घंटों में समाप्त हो जाती है।
तर्पण का जल नदी में मिल जाता है।
दीपक कुछ समय बाद बुझ जाता है।
लेकिन…
हमारे कर्म की विरासत आगे चलती रहती है।
इसलिए अगली बार जब आप अपने पितरों के लिए जल अर्पित करें, तो एक छोटा सा संकल्प भी करिए—
मैं अपने घर को जोड़कर रखूँगा।
मैं अपने बच्चों को संस्कार दूँगा।
मैं अपनी संस्कृति को समझूँगा।
मैं अपने धर्म का सम्मान करूँगा।
मैं अपने देश के प्रति ईमानदार रहूँगा।
और कोशिश करूँगा कि मेरे बाद आने वाली पीढ़ी कह सके—
“हमारे पूर्वजों ने हमें सिर्फ संपत्ति नहीं, एक विरासत दी थी।”
शायद…
पितरों के लिए इससे बड़ी श्रद्धांजलि कोई नहीं।
🙏 ॐ पितृभ्यो नमः।
🚩 जय श्री राम।
🔱 हर हर महादेव।
🇮🇳 भारत माता की जय।
— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
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