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Monday, October 05, 2026

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लोकतंत्र में वोट सिर्फ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है

हम भारतीयों की एक बड़ी खूबी है—हम हर चीज़ पर राय रखते हैं।

क्रिकेट पर राय, सरकार पर राय, महंगाई पर राय, धर्म पर राय... और आजकल तो पड़ोसी के घर की राजनीति पर भी राय! 😄

लेकिन एक चीज़ पर हम उतने गंभीर नहीं हैं—

हमारा वोट।

आज देश में मतदाता सूची को लेकर बहस चल रही है। SIR, Form 6, नाम जुड़ना, नाम हटना, दस्तावेज़, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट—इन सब पर राजनीतिक बयानबाज़ी हो रही है। आज सुप्रीम कोर्ट ने भी Form 6 में किए गए बदलावों को लेकर निर्वाचन आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। The Indian Express

अब यहाँ मेरी एक सीधी-सी बात है।

मतदाता सूची साफ होनी चाहिए।
लेकिन प्रक्रिया भी साफ होनी चाहिए।

दोनों बातें एक साथ सही हो सकती हैं।


सनातन हमें क्या सिखाता है?

हम अक्सर धर्म को मंदिर, पूजा और त्योहार तक सीमित कर देते हैं।

लेकिन सनातन का मूल तो धर्म और कर्तव्य है।

धर्म का अर्थ केवल पूजा नहीं है।

जो सही है, उसे सही कहना भी धर्म है।
जो गलत है, उसके खिलाफ आवाज उठाना भी धर्म है।
और अपनी जिम्मेदारी निभाना भी धर्म है।

इसलिए एक नागरिक के रूप में अपना वोट देना भी हमारे लोकतांत्रिक कर्तव्य का हिस्सा है।

हम पाँच घंटे WhatsApp पर यह तय करने में लगा देते हैं कि कौन देशभक्त है और कौन नहीं।

लेकिन पाँच मिनट निकालकर यह देखना भूल जाते हैं कि—

मेरा नाम voter list में है भी या नहीं?


“मेरे एक वोट से क्या फर्क पड़ेगा?”

यही सोच सबसे खतरनाक है।

एक आदमी कहता है—मेरे एक वोट से क्या होगा?

दूसरा भी यही कहता है।

तीसरा भी।

फिर चुनाव के बाद हम पूछते हैं—

“ये सरकार कैसे आ गई?”

भाई साहब, लोकतंत्र में सरकार आसमान से नहीं उतरती।

हम ही चुनते हैं।

इसलिए चुनाव के समय केवल नेता की रैली देखने से काम नहीं चलेगा।

अपना नाम मतदाता सूची में देखिए।

जरूरत हो तो सही प्रक्रिया से नाम जुड़वाइए।

गलत नाम हो तो सुधार कराइए।

और सबसे जरूरी—

जिसे वोट दें, सोच-समझकर दें।


BJP पसंद है, तो भी सवाल पूछना सीखिए

मैं व्यक्तिगत रूप से BJP के विचारों और उसके राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के करीब महसूस करता हूँ।

मुझे भारत की सभ्यता, संस्कृति और सनातन पर गर्व है।

लेकिन मेरी नजर में किसी राजनीतिक दल का समर्थन करने का अर्थ यह नहीं है कि उसके हर फैसले पर आंख बंद कर ली जाए।

भक्ति भगवान की कीजिए।
लोकतंत्र में विवेक रखिए।

सरकार अच्छा काम करे तो समर्थन कीजिए।

गलत करे तो सवाल कीजिए।

और विपक्ष गलत आरोप लगाए तो उसका विरोध कीजिए।

यही mature democracy है।

मुझे लगता है कि आज भारत को अंधभक्तों से ज्यादा जागरूक नागरिकों की जरूरत है।

क्योंकि मजबूत लोकतंत्र सिर्फ मजबूत सरकार से नहीं बनता।

मजबूत नागरिकों से बनता है।


चुनाव आयोग पर भरोसा क्यों जरूरी है?

क्योंकि चुनाव आयोग किसी पार्टी की संपत्ति नहीं है।

वह लोकतंत्र की संस्था है।

इसलिए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे तो जवाब भी तथ्यों और पारदर्शिता से मिलना चाहिए।

और दूसरी तरफ, चुनाव आयोग का मतदाता सूची को साफ और अद्यतन रखना भी जरूरी काम है। निर्वाचन आयोग का नागरिक पोर्टल वर्तमान में SIR-2026 से संबंधित सेवाएँ और Form 6 जैसी मतदाता पंजीकरण सुविधाएँ उपलब्ध करा रहा है। Voter Helpline

फर्जी नाम हटने चाहिए।
मृत व्यक्तियों के नाम हटने चाहिए।
डुप्लीकेट entries हटनी चाहिए।
लेकिन किसी योग्य भारतीय नागरिक का वोट गलती से नहीं छूटना चाहिए।

बस इतनी सी बात है।


और यहाँ सनातन फिर सामने आता है…

श्रीराम ने हमें एक बात बहुत गहरी सिखाई—

मर्यादा।

राजनीति में भी मर्यादा होनी चाहिए।

आलोचना हो—लेकिन झूठ के बिना।

विरोध हो—लेकिन हिंसा के बिना।

समर्थन हो—लेकिन अंधेपन के बिना।

राष्ट्रवाद हो—लेकिन जिम्मेदारी के साथ।

और धर्म हो—

तो आचरण में दिखना चाहिए।

आज हम “जय श्री राम” बोलते हैं।

बहुत अच्छी बात है।

लेकिन राम के जीवन से हमने क्या सीखा?

सत्य?
कर्तव्य?
त्याग?
मर्यादा?
न्याय?

अगर इन चार-पाँच चीजों को अपने जीवन में उतार लिया तो शायद सनातन को किसी से बचाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।


मेरा वोट मेरी जिम्मेदारी है

अंत में मेरी बात बहुत सरल है।

मुझे BJP पसंद हो सकती है।

आपको कोई दूसरी पार्टी पसंद हो सकती है।

किसी को राजनीति से कोई लेना-देना न हो सकता है।

कोई बात नहीं।

लेकिन एक चीज़ हम सबकी समान है—

हम भारत के नागरिक हैं।

इसलिए अपना वोट बचाइए।

अपना वोट समझकर दीजिए।

और लोकतंत्र को मजबूत रखिए।

क्योंकि—

“जिस देश में नागरिक जागता है, वहाँ लोकतंत्र मजबूत रहता है।
और जिस दिन नागरिक केवल भीड़ बन जाता है, उस दिन लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।”

सनातन हमें सिर्फ आस्था नहीं देता।

वह हमें कर्तव्य भी देता है।

और शायद आज भारत को इसी कर्तव्य-बोध की सबसे ज्यादा जरूरत है।

🚩 जय श्री राम।
हर हर महादेव।
वंदे मातरम्। 🇮🇳

— देव वैदिक
व्यक्तिगत विचार | devvaidik.in



Sunday, February 18, 2018

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सहनशीलता या कायरता

हम भारतीय इतने सहनशील हो गए हैं कि कोई भी हमारे देश के विरूद्ध  कुछ भी बोल जाता है और हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बोलकर चुप रह जाते हैं।  ये एक कायर समाज की पहचान है और कहीं ना कहीं हमारा समाज भी इसी तरह का होता जा  रहा है।  सहनशीलता की भी एक तय सीमा होनी चाहिए।  अगर कोई हमारे देश के सैनिकों  को  धर्म के आधार पर बांटे या कोई पाकिस्तान परस्त  नेता खुलेआम पाकिस्तान के समर्थन में मीडिया को और आम लोगों को भड़काए  और हमारी सरकार और हम उसका विरोध भी खुलकर ना कर सकें तो समझ लो की हम एक कायर समाज के बीज बो रहे हैं। मुँझे  यह समझ में नहीं आता है कि हमारी सरकार और जो लोग सत्ता में बैठे हैं, वो ऐसे लोगों को,

Sunday, January 28, 2018

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देश की दिशा और दशा

इस २६ जनवरी को हम सब ने बहुत ही धूम-धाम से हमारे देश का उनहत्तरवाँ गणतंत्र दिवस मनाया।  प्रातः काल से ही मैं टेलीविज़न सेट के सामने बैठ कर पुरे परेड को अच्छी तरह से देखा।  अच्छा लगा।  लेकिन शाम होते-होते मन व्यथित हो उठा।  पता है क्यों! क्योंकि हमारे ही राज्य के काशगंज जिले में  एक लड़के को केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि कुछ समूदाय को उसका झंडा लहराना पसंद नहीं आया।  और यूं  कहें  की उसने भारतीय तिरंगे को कुछ देश द्रोहियों  के मध्य ले जाने का साहस किया।

Sunday, January 29, 2017

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मन की बात

आज सुबह ११ बजे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की "मन की बात" कार्यक्रम सुना । एक बात जो मन को छू गयी, वो थी मोदी जी द्वारा कहा गया एक बात की "प्रतिस्प्रधा अपने आप से करो ना की किसी और से"। मैं आज दिन भर यही सोचता रहा और इसी पर चिंतन करा को पाया की यह बात सौ फीसदी सच है दुसरो से प्रतिस्प्रधा करने पर तीन बात हो सकती है
१. अवसाद २. अहंकार और ३. अवकाश (कुछ ना करना) और यह तीनों ही स्थिति सही नहीं है। अवसाद अर्थात चिंता में हम अपने भाग्य को दोष देकर और जो है उसी में संतोष करने लगते है, जिससे आगे बढ़ना असंभव जाता है अहंकार में आने से हम अपने आप को सबसे अच्छा मान बैठते हैं तो और सब हमें तिनके के सामान लगते हैं और

Monday, October 27, 2014

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ब्रतशील जीवन और अवतार



अवतारों की पुण्य प्रक्रिया भी निर्वाध रीति से बिना किसी अर्चन के संपन्न नहीं हो जाती, उसमे पग - पग पर अवरोध और आक्रमण सामने आते हैं । ‍‍‍ यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों का है जो अवांछनीयता की सड़ी कीचड़ में ही डांस, मच्छरों की तरह अपनी जिंदगी देखते हैं । ‍‍‍कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश वर्चस्व सहन ही नहीं होता । ‍‍‍ इसके अतिरिक्त सड़े टमाटर का भी एक वर्ग है, जो पेट में रहने वाले कीड़ों की, चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की , आस्तीन में पलने वाले सांपो की तरह जहाँ आश्रय पाते हैं, वहीं खोखला भी करते हैं । बिच्छू अपनी माँ के पेट का मांस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राणहरण करने के उपरांत ही
Avtar
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काश मैं स्वयं को समझ पाता




बड़ी अजीब उलझन है, मैं कौन हूँ ? सवाल छोटा सा है, पर जबाब ढूंढे नहीं मिलता । यूं कहने को तो हम बुद्धिमान हैं । अब तक ना जाने कितने क्यू? क्या? कैसे? किसलिए? की पहेलिया सुलझा चुके । धरती आकाश का चप्पा - चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया।
Who am I
इस बौद्धिक कौशलता की खूब प्रशंसा भी हुई। लेकिन इस छोटे से सवाल का समाधान ना होने के कारण सारी बौद्धिक करामातें धरी की धरी रह गयी। और बेचारा 'मैं ' अपना परिचय ना पा सकने के कारण नित नयी परेशानियो में फंसता उलझता चला गया । अनगिनत बिडंबनाये -बिभीषिकाए उसे संतृप्त करती चली गयी ।

इससे उबरना तभी संभव है जब 'मैं' अपनी खोजबीन करे । तनिक सोचे जिस काया को शरीर समझा जाता है, क्या यही मैं हूँ, क्या कष्ट, चोट, भूख, शीत - आतप आदि से पग-२ पर ब्याकुल होने वाला, अपनी सहायता के लिए बाजार, दरजी, किसान, रसोइया, चर्मकार, चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही 'मैं' हूँ ?