Thursday, October 08, 2026

गरबा में कौन आए? सवाल धर्म का है या संस्कृति की मर्यादा का?

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…

नमस्कार।

नवरात्रि है।

चारों तरफ माँ दुर्गा की भक्ति है।
कहीं पंडाल सजे हैं, कहीं आरती हो रही है, कहीं डांडिया है और कहीं गरबा।

रात में ढोल की आवाज सुनाई देती है—


“जय माता दी!”

चेहरों पर उत्साह है।

युवा पीढ़ी अपनी मस्ती में है।

परंपरा भी है, उत्सव भी है।

लेकिन इन दिनों एक सवाल फिर चर्चा में है—

गरबा आखिर है क्या?

सिर्फ डांस?

सिर्फ entertainment?

एक cultural event?

या फिर माँ शक्ति की आराधना से जुड़ा धार्मिक आयोजन?

छत्तीसगढ़ में इसी सवाल ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया है। राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने मुस्लिम युवाओं से गरबा में शामिल होने के संदर्भ में धार्मिक परंपराओं और आयोजन समिति की अनुमति का सम्मान करने की अपील की है। इस पर BJP ने उनका समर्थन किया, जबकि विपक्ष की ओर से इस पर सवाल उठाए गए। The Times of India

अब मेरी अपनी सोच सुनिए।


मेरे लिए गरबा सिर्फ डांस नहीं है

मैं सनातनी हिंदू हूँ।

इसलिए मेरे लिए नवरात्रि कोई “नौ दिन का event” नहीं है।

यह माँ शक्ति की उपासना है।

हमारे घर में माँ दुर्गा के सामने दीपक जलता है।

आरती होती है।

उपवास रखा जाता है।

मंदिर जाते हैं।

और जब गरबा होता है, तो उसके पीछे भी एक धार्मिक और सांस्कृतिक भाव होता है।

हाँ, आज के समय में बहुत से गरबा आयोजन बड़े commercial और entertainment events भी बन गए हैं।

यह वास्तविकता है।

लेकिन इससे गरबा की जड़ें नहीं बदल जातीं।

जिस परंपरा की जड़ धर्म में हो, उसकी मर्यादा को समझना भी जरूरी है।


अब सवाल आता है—कौन गरबा खेल सकता है?

यहीं बात थोड़ी संवेदनशील हो जाती है।

मेरी राय में इसका उत्तर केवल “हिंदू” या “मुस्लिम” में ढूँढना सही नहीं होगा।

पहला सवाल होना चाहिए—

आयोजन का स्वरूप क्या है?

अगर कोई कार्यक्रम खुले तौर पर एक commercial dance event है, तो उसके rules आयोजक तय करेंगे।

लेकिन अगर कोई आयोजन धार्मिक अनुष्ठान के रूप में हो रहा है, जहाँ माँ की पूजा, आरती और धार्मिक परंपराएँ उसका हिस्सा हैं, तो वहाँ आने वाले हर व्यक्ति से उस आयोजन की मर्यादा और नियमों का सम्मान अपेक्षित होना स्वाभाविक है।

यह बात सिर्फ गरबा पर लागू नहीं होती।

आप किसी भी धर्मस्थल में जाइए।

मंदिर है तो मंदिर की मर्यादा होगी।

गुरुद्वारा है तो उसकी मर्यादा होगी।

मस्जिद है तो उसकी अपनी मर्यादा होगी।

चर्च है तो उसकी अपनी परंपराएँ होंगी।

**सम्मान का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी पहचान छोड़ दें।

सम्मान का अर्थ है—दूसरे की आस्था का मजाक न बनाएं।**


लेकिन क्या मुसलमान गरबा देख भी नहीं सकता?

यहाँ मैं थोड़ी स्पष्ट बात कहना चाहूँगा।

किसी व्यक्ति को किसी दूसरे धर्म की संस्कृति को देखना, समझना या उसमें रुचि लेना अपने आप में कोई अपराध नहीं है।

भारत की खूबसूरती ही यही है कि यहाँ लोग एक-दूसरे के त्योहार देखते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं।

लेकिन भागीदारी और दर्शक होने में फर्क है।

और धार्मिक भागीदारी तथा केवल मनोरंजन में भी फर्क है।

मुझे लगता है कि इस अंतर को समझे बिना हम हर मुद्दे को “सांप्रदायिक” बनाकर बहस खत्म कर देते हैं।


सनातन किसी के खिलाफ नहीं है—लेकिन अपनी मर्यादा के पक्ष में जरूर है

यह बात मैं बहुत मजबूती से कहना चाहता हूँ।

मैं हिंदू हूँ।

मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है।

मुझे माँ दुर्गा पर आस्था है।

मुझे मंदिरों पर गर्व है।

मुझे भगवा ध्वज देखकर अच्छा लगता है।

मुझे “जय श्री राम” और “हर हर महादेव” बोलने में गर्व महसूस होता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से नफरत करता हूँ।

अपनी पहचान पर गर्व करने के लिए दूसरे की पहचान से नफरत करना जरूरी नहीं है।

बल्कि असली आत्मविश्वास तो तब है जब हम अपनी परंपरा को इतने विश्वास से जीएँ कि हमें अपनी पहचान छिपाने या उससे शर्माने की जरूरत ही न पड़े।


मुझे एक बात से परेशानी होती है…

आजकल त्योहार भी सोशल मीडिया content बन गए हैं।

नवरात्रि आई—

Reel बनाओ।

गरबा हुआ—

Video बनाओ।

मंदिर गए—

Selfie डालो।

आरती हुई—

Story लगाओ।

इसमें कुछ गलत नहीं है।

Technology और social media हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं।

लेकिन कभी-कभी मैं सोचता हूँ—

हम त्योहार मना रहे हैं या सिर्फ त्योहार की content creation कर रहे हैं?

क्या हमें पता भी है कि हम किसकी आराधना कर रहे हैं?

क्यों नवरात्रि नौ दिन की है?

माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूप क्या हैं?

गरबा का धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ क्या है?

हमारे बच्चों को यह पता है?

या उन्हें केवल इतना पता है कि—

“आज गरबा night है!”


और अब राजनीति भी इसमें आ गई

जैसे ही धर्म और सार्वजनिक आयोजन की बात आती है, राजनीति पीछे कैसे रह सकती है?

छत्तीसगढ़ में इस मुद्दे पर वक्फ बोर्ड के बयान के बाद BJP और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। The Times of India

मैं BJP के राजनीतिक विचारों के काफी करीब हूँ।

यह बात मैं छिपाता नहीं।

मुझे भारत की सांस्कृतिक पहचान पर गर्व है।

मैं चाहता हूँ कि हिंदू अपनी आस्था को लेकर defensive न रहें।

लेकिन एक बात BJP सहित हर राजनीतिक दल से कहूँगा—

धर्म को राजनीति में लाने से पहले धर्म की मर्यादा समझिए।

और विपक्ष से भी मेरा यही सवाल है—

हर धार्मिक sensitivity की बात को “नफरत” या “ध्रुवीकरण” कह देना भी उचित नहीं है।

कभी-कभी किसी समुदाय से अपनी धार्मिक मर्यादा का सम्मान करने की अपेक्षा करना भी एक legitimate social discussion हो सकता है।


हिंदुत्व का अर्थ मेरे लिए क्या है?

मेरे लिए हिंदुत्व का अर्थ यह नहीं है कि—

“कौन हमारे साथ है और कौन हमारे खिलाफ?”

मेरे लिए हिंदुत्व का अर्थ है—

आस्था।
आत्मसम्मान।
संस्कार।
मर्यादा।
कर्तव्य।
सत्य।
सेवा।

अगर कोई हमारे मंदिर में आता है और श्रद्धा से सिर झुकाता है, तो मैं उसका सम्मान करूँगा।

लेकिन अगर कोई धार्मिक आयोजन में आता है और उस धर्म का मजाक उड़ाता है, नियम तोड़ता है या माहौल खराब करता है, तो उसका विरोध भी होना चाहिए।

और यही नियम हर धर्म के लिए समान होना चाहिए।


हमें नियम बनाइए, दुश्मन नहीं

यही शायद इस पूरे विवाद की सबसे जरूरी बात है।

किसी आयोजन के आयोजकों को चाहिए कि वे पहले से स्पष्ट नियम बनाएँ।

Entry rules क्या हैं?

Religious rituals में participation कैसे होगा?

Security कैसे होगी?

Dress code है या नहीं?

Identity verification की जरूरत है या नहीं?

और अगर कोई नियम तोड़ता है तो कार्रवाई क्या होगी?

Rules पहले तय कीजिए।

फिर उन्हीं rules को सब पर समान रूप से लागू कीजिए।

समस्या तब पैदा होती है जब rules अस्पष्ट हों और बाद में हर चीज़ का फैसला पहचान देखकर होने लगे।


सनातन की ताकत क्या है?

मेरे विचार से सनातन की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशालता है।

हमारे यहाँ शास्त्रों में प्रश्न पूछने की परंपरा है।

विचार करने की परंपरा है।

संवाद की परंपरा है।

लेकिन इसका अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है।

आज हमें शायद दो चीज़ें एक साथ करनी होंगी—

अपनी संस्कृति पर गर्व भी और उसके अर्थ की समझ भी।

सिर्फ भगवा पहन लेने से संस्कृति नहीं बचती।

सिर्फ नारे लगाने से संस्कृति नहीं बचती।

और सिर्फ किसी दूसरे को रोक देने से भी संस्कृति नहीं बचती।

संस्कृति तब बचती है जब अगली पीढ़ी उसे समझती है, अपनाती है और सम्मान से जीती है।


मेरे लिए असली गरबा यही है

जब माँ की आरती हो और घर का बच्चा पूछे—

“माँ कौन हैं?”

जब पिता बच्चे को बताए—

“ये सिर्फ dance नहीं है, इसके पीछे हमारी परंपरा है।”

जब युवा modern भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ा भी हो।

जब हम दूसरे धर्म की इज्जत करें लेकिन अपनी आस्था को लेकर शर्मिंदा न हों।

जब राजनीति हो तो मुद्दों पर हो।

जब बहस हो तो तथ्यों पर हो।

और जब धर्म की बात हो—

तो सबसे पहले श्रद्धा और मर्यादा की बात हो।


अंत में मेरी एक छोटी-सी बात

मुझे नहीं लगता कि हर गरबा controversy का समाधान “किसे बाहर निकालना है” में है।

मुझे लगता है कि समाधान है—

यह तय करना कि गरबा है क्या।

अगर यह धार्मिक आयोजन है—

तो उसकी धार्मिक मर्यादा रहे।

अगर यह public cultural event है—

तो स्पष्ट और समान rules हों।

और अगर कोई व्यक्ति शामिल हो—

तो वह आयोजकों के नियमों और उस स्थान की आस्था का सम्मान करे।

बस।

इतना तो होना ही चाहिए।

क्योंकि—

अपनी संस्कृति की रक्षा का सबसे पहला कदम है—उसे खुद समझना।

और दूसरा—

उस पर गर्व करना।

तीसरा—

उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना।

बाकी राजनीति तो आती-जाती रहेगी।

सरकारें बदलेंगी।

नेता बदलेंगे।

बयान बदलेंगे।

लेकिन—

माँ शक्ति की आराधना, हमारी संस्कृति और हमारी सनातन चेतना…

यह हमसे बहुत बड़ी है।

🙏 जय माता दी।
🚩 जय श्री राम।
🔱 हर हर महादेव।
🇮🇳 भारत माता की जय।

— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
www.devvaidik.in

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