अवतारों की पुण्य प्रक्रिया भी निर्वाध रीति से बिना किसी अर्चन के संपन्न नहीं हो जाती, उसमे पग - पग पर अवरोध और आक्रमण सामने आते हैं । यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों का है जो अवांछनीयता की सड़ी कीचड़ में ही डांस, मच्छरों की तरह अपनी जिंदगी देखते हैं । कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश वर्चस्व सहन ही नहीं होता । इसके अतिरिक्त सड़े टमाटर का भी एक वर्ग है, जो पेट में रहने वाले कीड़ों की, चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की , आस्तीन में पलने वाले सांपो की तरह जहाँ आश्रय पाते हैं, वहीं खोखला भी करते हैं । बिच्छू अपनी माँ के पेट का मांस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राणहरण करने के उपरांत ही
उथली और मजबूत किनारों से रहित नदियाँ तनिक से वर्षा होने पर सब ओर बिखर पड़ती हैं और बाढ़ का रूप धारण कर पास पड़ोस के खेतों - गॉवौ को नष्ट भ्रष्ट कर देती हैं । इसके विपरीत वे नदियाँ भी हैं जिनमे प्रचंड वेगयुक्त जलधारा बहती हैं किन्तु उफनने की दुर्घटना उत्पन्न नहीं होती । कारण की वे गहरी होती हैं और उनके किनारे मजबुत और सुदृढ़ होते हैं । तनिक - से - आकर्षण और भय का अवसर आते ही मनुष्य अपने चरित्र और ईमान को खो बैठता है । थोड़ी - सी - प्रतिकूलता, तनिक सी विरोधी परिश्थितियां उसे सहन नहीं होती और आवेशग्रस्त स्थिति उत्पन्न कर देती हैं । इसका कारण ब्यक्ति की आंतरिक उथलापन है । ब्रतशील जीवन की कमी है । ऐसे लोग तभी तक अच्छे लग सकते हैं जब तक की परीक्षा का अवसर नहीं आता । जैसे ही परीक्षाओं की घड़ी आयी, वैसे ही वे मर्यादाओं को तोड़-फोरकर उथले नालों की तरह विखरते हैं और अपने पड़ोस, समाज व पूरी मनुष्यता के लिए बाढ़ का संकट उत्पन्न करते हैं । मजबुत किनारों का तात्पर्य है - ब्रतशील जीवन । ब्रत आदर्शो के प्रति विश्वास है , निष्ठा है । ब्रत द्वारा मनुष्य लक्ष्य तक पहुँचने हेतु आत्मशक्ति संजोने - अर्जित करने का पर्यत्न करता है । विश्वास जितना शशक्त होता है, निष्ठा जितनी अविचल होती है, संकल्प जितना सुदृढ़ होता है, ब्यक्ति उतनी ही सुगमता से तथा सफलता से जीवन की पूर्णता प्राप्त करता है । शक्ति शक्ति है , इसका समुचित उपयोग तभी संभव है, जबकि यह एकत्रित हो और समुचित दिशा की ओर केंद्रित हो ।
ब्रत से यही असाधारण कार्य संपन्न होता है । इसमें मानवीय जीवन की खोटी - बिखरती शक्तियां एकत्रित एकाग्र होकर जीवन लक्ष्य की दिशा में प्रवाहित होने लगती हैं । हर दिन ब्रत है, दिन का हर पल ब्रत है । सुख - समृद्धि , संतान - स्वास्थ्य आकांक्षा से किया प्रयत्न भी ब्रत है ; तो सिद्ध - बुद्ध - मुक्त अवस्था प्राप्त करने हेतु साधुता को साढ़े रहना भी ब्रत है । खाना भी ब्रत है , नहीं खाना भी ब्रत है । जीवन संग्राम में जूझना भी ब्रत है, मौन - ध्यानी बनकर एकासन पर बैठे रहना भी ब्रत है । जीवन का हर कर्म, जीवन का हर प्रयत्न ब्रत हो सकता है । यदि उसमे ईश्वर से एकात्मता की आकांक्षा और आत्मा की जागरूकता निहित हों । आत्म बल को जगाने - साधने का प्रयत्न ही ब्रत है । ब्रत में आत्मा परमात्मा की ओर उन्मुख होती है । यानी जीवन की परमात्मोन्मुखता ही ब्रत है । ब्रत के हजारों हजार नाम हैं । सातों वारों के ब्रत हैं । पंद्रह तिथिओं के ब्रत हैं । बारह मासों के ब्रत हैं । ब्रतशील जीवन का सार मर्म है - जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट साधन एवं साहस का सुसंचय ।
ब्रत से यही असाधारण कार्य संपन्न होता है । इसमें मानवीय जीवन की खोटी - बिखरती शक्तियां एकत्रित एकाग्र होकर जीवन लक्ष्य की दिशा में प्रवाहित होने लगती हैं । हर दिन ब्रत है, दिन का हर पल ब्रत है । सुख - समृद्धि , संतान - स्वास्थ्य आकांक्षा से किया प्रयत्न भी ब्रत है ; तो सिद्ध - बुद्ध - मुक्त अवस्था प्राप्त करने हेतु साधुता को साढ़े रहना भी ब्रत है । खाना भी ब्रत है , नहीं खाना भी ब्रत है । जीवन संग्राम में जूझना भी ब्रत है, मौन - ध्यानी बनकर एकासन पर बैठे रहना भी ब्रत है । जीवन का हर कर्म, जीवन का हर प्रयत्न ब्रत हो सकता है । यदि उसमे ईश्वर से एकात्मता की आकांक्षा और आत्मा की जागरूकता निहित हों । आत्म बल को जगाने - साधने का प्रयत्न ही ब्रत है । ब्रत में आत्मा परमात्मा की ओर उन्मुख होती है । यानी जीवन की परमात्मोन्मुखता ही ब्रत है । ब्रत के हजारों हजार नाम हैं । सातों वारों के ब्रत हैं । पंद्रह तिथिओं के ब्रत हैं । बारह मासों के ब्रत हैं । ब्रतशील जीवन का सार मर्म है - जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट साधन एवं साहस का सुसंचय ।
