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Sunday, October 04, 2026

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सनातन सिर्फ “जय श्री राम” नहीं है — घर, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी भी है

 सनातन सिर्फ “जय श्री राम” नहीं है — घर, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी भी है

आज पितृपक्ष की मातृ नवमी है।

घर में पितरों का स्मरण हो रहा होगा। कहीं तर्पण हो रहा होगा, कहीं ब्राह्मण भोजन, कहीं गाय को रोटी, कहीं गरीब को भोजन।

और कहीं-कहीं बस WhatsApp Status पर एक फोटो लगी होगी—
“ॐ पितृ देवाय नमः।”

मन में एक सवाल आया...

क्या हमारा धर्म सिर्फ पूजा-पाठ तक रह गया है?

मैं सनातनी हिंदू हूँ। मुझे मंदिर जाना अच्छा लगता है। मुझे मंत्र अच्छे लगते हैं। मुझे भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, महादेव और माँ दुर्गा में आस्था है।

और हाँ, राजनीतिक रूप से मेरा झुकाव भारतीय जनता पार्टी की तरफ है।

लेकिन मैं एक बात बहुत साफ मानता हूँ—

सनातन धर्म को किसी राजनीतिक दल के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

सरकारें आती हैं, जाती हैं। नेता बदलते हैं। चुनाव आते हैं, परिणाम आते हैं।

लेकिन संस्कार और संस्कृति घर से बनती है।



हम सनातन की बात करते हैं, लेकिन सनातन जीते कितने हैं?

हम बड़े गर्व से कहते हैं—

“हमारी 5000 साल पुरानी संस्कृति है।”

बिल्कुल है।

लेकिन अपने ही माता-पिता से बात करने का समय नहीं है।

बच्चों को रामायण की कहानी सुनाने का समय नहीं है।

घर में दादा-दादी बैठे हैं और बच्चे मोबाइल में व्यस्त हैं।

मंदिर में जाकर 11 रुपये चढ़ा देंगे, लेकिन रास्ते में किसी जरूरतमंद को देखकर नजर फेर लेंगे।

गंगा को माँ कहेंगे, फिर उसी नदी में कूड़ा डाल देंगे।

भारत माता की जय बोलेंगे, फिर टैक्स चोरी को “जुगाड़” कह देंगे।

और सबसे मजेदार बात—

सोशल मीडिया पर हम धर्म की रक्षा करने निकल पड़ते हैं, लेकिन अपने घर में धर्म के मूल सिद्धांतों पर ध्यान नहीं देते।

सत्य। संयम। सेवा। कर्तव्य। मर्यादा।

यही तो सनातन है।

मुझे हिंदुत्व चाहिए, लेकिन दिखावे वाला नहीं

मेरे लिए हिंदुत्व का मतलब किसी के प्रति नफरत पैदा करना नहीं है।

मेरे लिए हिंदुत्व का मतलब है—

गलत के खिलाफ खड़ा होना।

सही के साथ खड़ा होना।

कमजोर की मदद करना।

अपने परिवार की जिम्मेदारी निभाना।

अपनी संस्कृति पर गर्व करना।

अपने देश के प्रति ईमानदार रहना।

और जब अपनी तरफ से गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करने की हिम्मत रखना।

भगवान श्रीराम ने सिर्फ राक्षसों को नहीं हराया था। उन्होंने अपने जीवन में मर्यादा स्थापित की थी।

आज हमें उसी मर्यादा की जरूरत है।

राजनीति भी जरूरी है, लेकिन राजनीति ही सब कुछ नहीं है

मैं BJP के राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी हद तक सहमत हूँ।

मुझे लगता है कि भारत को अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करने का अधिकार है।

मुझे अच्छा लगता है जब हमारी सभ्यता, हमारे मंदिर, हमारी परंपराएँ और हमारी विरासत राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बनती हैं।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं हर नेता की हर बात को सही मानूँ।

आस्था आँख बंद करके चलने का नाम नहीं है।

हमारे शास्त्रों ने भी प्रश्न पूछने की परंपरा दी है।

और लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना भी राष्ट्र-विरोध नहीं है।

आज देश में मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस चल रही है। चुनाव आयोग खुद मतदाता सूची को अपडेट करने और SIR जैसे प्रक्रियाओं के माध्यम से रिकॉर्ड सुधारने की व्यवस्था चला रहा है।

मेरी सीधी सोच है—

वोटर लिस्ट साफ होनी चाहिए।

लेकिन प्रक्रिया भी ऐसी होनी चाहिए जिस पर आम नागरिक को भरोसा हो।

सरकार को सवालों का जवाब देना चाहिए।

विपक्ष को भी आरोप लगाने से पहले तथ्य सामने रखने चाहिए।

और जनता को?

जनता को WhatsApp University से बाहर निकलकर तथ्य देखना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे ताकतवर चीज़ न BJP है, न Congress।

सबसे ताकतवर चीज़ जागरूक नागरिक है।

सनातन की लड़ाई बाहर से पहले भीतर की है

हम पूछते रहते हैं—

“हिंदू खतरे में है क्या?”

मेरा जवाब थोड़ा अलग है।

पहले यह पूछिए—

क्या हमारा परिवार मजबूत है?

क्या हमारे बच्चों को अपनी संस्कृति पता है?

क्या उन्हें राम और रावण में सिर्फ युद्ध दिखाई देता है, या चरित्र का फर्क भी समझ आता है?

क्या उन्हें भगवद्गीता का एक भी श्लोक पता है?

क्या उन्हें अपने दादा-दादी की कहानी सुनने में रुचि है?

क्या हमें अपने त्योहारों का अर्थ मालूम है?

क्या हम अपने मंदिर को साफ रखते हैं?

क्या हम अपने आसपास के समाज के प्रति जिम्मेदार हैं?

अगर इन सवालों के जवाब कमजोर हैं, तो केवल नारे लगाने से सनातन मजबूत नहीं होगा।

मुझे ऐसा हिंदू भारत चाहिए…

जहाँ मंदिर भव्य हों, लेकिन स्कूल भी अच्छे हों।

जहाँ धर्म का सम्मान हो, लेकिन कानून का भी सम्मान हो।

जहाँ राम का नाम लिया जाए, तो राम के चरित्र को भी याद रखा जाए।

जहाँ गाय की सेवा की बात हो, तो मनुष्य की सेवा भी हो।

जहाँ राष्ट्रवाद हो, लेकिन राष्ट्र की जिम्मेदारियाँ निभाने का साहस भी हो।

जहाँ युवा Instagram Reel में “सनातनी” लिखने के साथ-साथ अपने माता-पिता के पैर भी छुए।

जहाँ व्यापारी भगवान की पूजा करने के बाद अपने कर्मचारियों का हक न मारे।

जहाँ कर्मचारी ईमानदारी से काम करे।

जहाँ अधिकारी रिश्वत लेने में शर्म महसूस करे।

और जहाँ नेता मंदिर जाए तो अच्छी बात है—
लेकिन जनता के प्रति अपना धर्म निभाए, यह उससे भी बड़ी बात है।

BJP से मेरी अपेक्षा भी यही है

मैं BJP को पसंद करता हूँ।

लेकिन मेरी अपेक्षा किसी भी राजनीतिक दल से सिर्फ यह नहीं है कि वह हिंदू मुद्दों पर बोले।

मेरी अपेक्षा है कि वह सुशासन दे।

रोजगार पर काम करे।

व्यापार आसान बनाए।

भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करे।

न्याय व्यवस्था मजबूत करे।

शिक्षा और स्वास्थ्य बेहतर करे।

और भारत की संस्कृति को सम्मान देते हुए आधुनिक भारत का निर्माण करे।

क्योंकि आखिरकार—

हिंदुत्व का अर्थ सिर्फ अतीत पर गर्व करना नहीं है।

हिंदुत्व का अर्थ ऐसा भविष्य बनाना भी है, जिस पर हमारी आने वाली पीढ़ियाँ गर्व करें।

पितरों को असली श्रद्धांजलि क्या है?

आज पितृपक्ष है।

हम अपने पूर्वजों को याद कर रहे हैं।

लेकिन शायद हमारे पितर हमसे सिर्फ पिंडदान नहीं माँगते होंगे।

वे चाहते होंगे कि उनकी आने वाली पीढ़ी ईमानदार हो।

अपने परिवार को जोड़े।

अपनी संस्कृति को समझे।

अपनी मिट्टी से जुड़ी रहे।

और देश को पहले से थोड़ा बेहतर छोड़कर जाए।

शायद यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।

इसलिए आज मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ—

सनातन को बचाने के लिए हमेशा किसी और से लड़ने की जरूरत नहीं है।

कभी-कभी अपने अंदर के अहंकार से लड़िए।

अपनी लालच से लड़िए।

अपनी आलस्य से लड़िए।

अपने दिखावे से लड़िए।

और अपने कर्तव्य से भागने की आदत से लड़िए।

क्योंकि…

सनातन की सबसे बड़ी ताकत उसका नारा नहीं, उसका आचरण है।

जय श्री राम।
हर हर महादेव।
भारत माता की जय। 🇮🇳🚩


Sunday, February 04, 2018

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जीवन एक पहेली

 मैंने यह पढ़ा था कि जीवन एक मायाजाल है, "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" इत्यादि-इत्यादि। कभी बिश्वास नहीं होता था! लेकिन यह सच है।
इसे इस तरह से समझते हैं की विज्ञान के हिसाब से अँधेरा कभी होता ही नहीं है लेकिन हमारी आखें रात के अँधेरे में देख नहीं सकती, ध्वनि भी हम एक निश्चित हर्ट्ज़ पर ही सुन सकते हैं, २० हर्ट्ज़ से लेकर २०००० हर्ट्ज़ तक।
इस संसार में कभी रात होते ही नहीं हैं। जब हमारे देश में रात हो रही होती है तो अमेरिका में सुबह हो रहे होते हैं।  इसी प्रकार के अनेक उदाहरण हैं जो यह सिद्ध करते हैं की हमारे सनातन धार्मिक ग्रन्थ में लिखे गए बातें केवल कोरी कल्पना नहीं है।

Monday, October 27, 2014

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ब्रतशील जीवन और अवतार



अवतारों की पुण्य प्रक्रिया भी निर्वाध रीति से बिना किसी अर्चन के संपन्न नहीं हो जाती, उसमे पग - पग पर अवरोध और आक्रमण सामने आते हैं । ‍‍‍ यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों का है जो अवांछनीयता की सड़ी कीचड़ में ही डांस, मच्छरों की तरह अपनी जिंदगी देखते हैं । ‍‍‍कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश वर्चस्व सहन ही नहीं होता । ‍‍‍ इसके अतिरिक्त सड़े टमाटर का भी एक वर्ग है, जो पेट में रहने वाले कीड़ों की, चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की , आस्तीन में पलने वाले सांपो की तरह जहाँ आश्रय पाते हैं, वहीं खोखला भी करते हैं । बिच्छू अपनी माँ के पेट का मांस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राणहरण करने के उपरांत ही
Avtar
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काश मैं स्वयं को समझ पाता




बड़ी अजीब उलझन है, मैं कौन हूँ ? सवाल छोटा सा है, पर जबाब ढूंढे नहीं मिलता । यूं कहने को तो हम बुद्धिमान हैं । अब तक ना जाने कितने क्यू? क्या? कैसे? किसलिए? की पहेलिया सुलझा चुके । धरती आकाश का चप्पा - चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया।
Who am I
इस बौद्धिक कौशलता की खूब प्रशंसा भी हुई। लेकिन इस छोटे से सवाल का समाधान ना होने के कारण सारी बौद्धिक करामातें धरी की धरी रह गयी। और बेचारा 'मैं ' अपना परिचय ना पा सकने के कारण नित नयी परेशानियो में फंसता उलझता चला गया । अनगिनत बिडंबनाये -बिभीषिकाए उसे संतृप्त करती चली गयी ।

इससे उबरना तभी संभव है जब 'मैं' अपनी खोजबीन करे । तनिक सोचे जिस काया को शरीर समझा जाता है, क्या यही मैं हूँ, क्या कष्ट, चोट, भूख, शीत - आतप आदि से पग-२ पर ब्याकुल होने वाला, अपनी सहायता के लिए बाजार, दरजी, किसान, रसोइया, चर्मकार, चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही 'मैं' हूँ ?