Sunday, January 07, 2018

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मेरे विचार

 मैं एक सामान्य नागरिक हूँ।  एक साधारण सा जीवन जी रहा हूँ।  पर मेरे विचार  साधारण नहीं हैं, उसमें असाधारन  विलक्षणता है।  आज का युग भी विचारों का है।  अब युद्ध सिर्फ तलवारों से नहीं लड़े जाते हैं, उसके पीछे विचारों का बहुत बड़ा  योगदान रहता है।  उदाहरण के लिए ISIS को ही ले लो....कितना प्रचार प्रसार इस आंतकी संगठन ने सोशल मीडिया के द्वारा करा था और कर रहा भी है। 
सोशल नेटवर्किंग साइट्स अब विचारों  के आदान-प्रदान के सबसे बड़े माध्यम  बन चुके है  और इसी के द्वारा राजनैतिक से लेकर अन्य सभी  संगठन अपने-अपने हितों  को साधने में लगे रहते हैं।  
एक विशेष तरह के प्रोपेगंडा को फैला कर वामपंथी से लेकर समाज विरोधी तत्व  सोशल नेटवर्किंग साइट्स को लगातार एक हथियार की तरह प्रयोग करने लगे हैं।  जहाँ तक सोशल मीडिया का प्रश्न है तो इसकी पहुँच अब भारत के सुदूर गावों  तक हो चूका है।  अब स्मार्ट फ़ोन को खरीदने में ग्रामीण  लोग भी आगे निकल चुके हैं।  ये अच्छा भी है,  ये होना चाहिए।

Sunday, January 29, 2017

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मन की बात

आज सुबह ११ बजे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की "मन की बात" कार्यक्रम सुना । एक बात जो मन को छू गयी, वो थी मोदी जी द्वारा कहा गया एक बात की "प्रतिस्प्रधा अपने आप से करो ना की किसी और से"। मैं आज दिन भर यही सोचता रहा और इसी पर चिंतन करा को पाया की यह बात सौ फीसदी सच है दुसरो से प्रतिस्प्रधा करने पर तीन बात हो सकती है
१. अवसाद २. अहंकार और ३. अवकाश (कुछ ना करना) और यह तीनों ही स्थिति सही नहीं है। अवसाद अर्थात चिंता में हम अपने भाग्य को दोष देकर और जो है उसी में संतोष करने लगते है, जिससे आगे बढ़ना असंभव जाता है अहंकार में आने से हम अपने आप को सबसे अच्छा मान बैठते हैं तो और सब हमें तिनके के सामान लगते हैं और

Tuesday, January 13, 2015

जीवन का लक्ष्य‍‍‍।



महर्षि याज्ञवलक्य अपनी समस्त संपत्ति को दोनों पत्नियों में बराबर बाँट कर गृह त्याग के लिए उद्यत हुए । मैत्रेयी को संतोष नहीं हुआ और वह आखिर पूछ ही बैठी " भगवन ! क्या मैं इस सब को लेकर जीवन मुक्ति का लाभ प्राप्त कर सकुंगी ? " क्या मैं मर जाउंगी ? आत्मसंतोष प्राप्त कर सकुंगी ? महर्षि ने अपने चिंतन का क्रम तोड़ते हुए कहा - " नहीं । ऐसा नहीं हो सकेगा । साधन सुविधा संपन्न सुखी जीवन जैसा तुम्हारा अब तक रहा उसी तरह आगे भी चलता रहेगा, अन्य सांसारिक लोगों की तरह ही तुम भी अपना जीवन सुख सुविधा के साथ बिता सकोगी । " मैत्रेयी का असंतोष दूर ना हुआ, और वो बोली " येणाह नामरताँ स्याम किमहं तेन कुर्याम् । " जिससे मुँझे अमृतत्व की प्राप्ति ना हो, उसे लेकर मैं क्या करुँगी? देव ! मुँझे यह सुख - सुविधा संपन्न सांसारिक जीवन नहीं चाहिए ।
Moksha

Monday, October 27, 2014

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ब्रतशील जीवन और अवतार



अवतारों की पुण्य प्रक्रिया भी निर्वाध रीति से बिना किसी अर्चन के संपन्न नहीं हो जाती, उसमे पग - पग पर अवरोध और आक्रमण सामने आते हैं । ‍‍‍ यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों का है जो अवांछनीयता की सड़ी कीचड़ में ही डांस, मच्छरों की तरह अपनी जिंदगी देखते हैं । ‍‍‍कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश वर्चस्व सहन ही नहीं होता । ‍‍‍ इसके अतिरिक्त सड़े टमाटर का भी एक वर्ग है, जो पेट में रहने वाले कीड़ों की, चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की , आस्तीन में पलने वाले सांपो की तरह जहाँ आश्रय पाते हैं, वहीं खोखला भी करते हैं । बिच्छू अपनी माँ के पेट का मांस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राणहरण करने के उपरांत ही
Avtar
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काश मैं स्वयं को समझ पाता




बड़ी अजीब उलझन है, मैं कौन हूँ ? सवाल छोटा सा है, पर जबाब ढूंढे नहीं मिलता । यूं कहने को तो हम बुद्धिमान हैं । अब तक ना जाने कितने क्यू? क्या? कैसे? किसलिए? की पहेलिया सुलझा चुके । धरती आकाश का चप्पा - चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया।
Who am I
इस बौद्धिक कौशलता की खूब प्रशंसा भी हुई। लेकिन इस छोटे से सवाल का समाधान ना होने के कारण सारी बौद्धिक करामातें धरी की धरी रह गयी। और बेचारा 'मैं ' अपना परिचय ना पा सकने के कारण नित नयी परेशानियो में फंसता उलझता चला गया । अनगिनत बिडंबनाये -बिभीषिकाए उसे संतृप्त करती चली गयी ।

इससे उबरना तभी संभव है जब 'मैं' अपनी खोजबीन करे । तनिक सोचे जिस काया को शरीर समझा जाता है, क्या यही मैं हूँ, क्या कष्ट, चोट, भूख, शीत - आतप आदि से पग-२ पर ब्याकुल होने वाला, अपनी सहायता के लिए बाजार, दरजी, किसान, रसोइया, चर्मकार, चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही 'मैं' हूँ ?