Tuesday, January 13, 2015

जीवन का लक्ष्य‍‍‍।



महर्षि याज्ञवलक्य अपनी समस्त संपत्ति को दोनों पत्नियों में बराबर बाँट कर गृह त्याग के लिए उद्यत हुए । मैत्रेयी को संतोष नहीं हुआ और वह आखिर पूछ ही बैठी " भगवन ! क्या मैं इस सब को लेकर जीवन मुक्ति का लाभ प्राप्त कर सकुंगी ? " क्या मैं मर जाउंगी ? आत्मसंतोष प्राप्त कर सकुंगी ? महर्षि ने अपने चिंतन का क्रम तोड़ते हुए कहा - " नहीं । ऐसा नहीं हो सकेगा । साधन सुविधा संपन्न सुखी जीवन जैसा तुम्हारा अब तक रहा उसी तरह आगे भी चलता रहेगा, अन्य सांसारिक लोगों की तरह ही तुम भी अपना जीवन सुख सुविधा के साथ बिता सकोगी । " मैत्रेयी का असंतोष दूर ना हुआ, और वो बोली " येणाह नामरताँ स्याम किमहं तेन कुर्याम् । " जिससे मुँझे अमृतत्व की प्राप्ति ना हो, उसे लेकर मैं क्या करुँगी? देव ! मुँझे यह सुख - सुविधा संपन्न सांसारिक जीवन नहीं चाहिए ।
Moksha

Monday, October 27, 2014

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ब्रतशील जीवन और अवतार



अवतारों की पुण्य प्रक्रिया भी निर्वाध रीति से बिना किसी अर्चन के संपन्न नहीं हो जाती, उसमे पग - पग पर अवरोध और आक्रमण सामने आते हैं । ‍‍‍ यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों का है जो अवांछनीयता की सड़ी कीचड़ में ही डांस, मच्छरों की तरह अपनी जिंदगी देखते हैं । ‍‍‍कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश वर्चस्व सहन ही नहीं होता । ‍‍‍ इसके अतिरिक्त सड़े टमाटर का भी एक वर्ग है, जो पेट में रहने वाले कीड़ों की, चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की , आस्तीन में पलने वाले सांपो की तरह जहाँ आश्रय पाते हैं, वहीं खोखला भी करते हैं । बिच्छू अपनी माँ के पेट का मांस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राणहरण करने के उपरांत ही
Avtar
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काश मैं स्वयं को समझ पाता




बड़ी अजीब उलझन है, मैं कौन हूँ ? सवाल छोटा सा है, पर जबाब ढूंढे नहीं मिलता । यूं कहने को तो हम बुद्धिमान हैं । अब तक ना जाने कितने क्यू? क्या? कैसे? किसलिए? की पहेलिया सुलझा चुके । धरती आकाश का चप्पा - चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया।
Who am I
इस बौद्धिक कौशलता की खूब प्रशंसा भी हुई। लेकिन इस छोटे से सवाल का समाधान ना होने के कारण सारी बौद्धिक करामातें धरी की धरी रह गयी। और बेचारा 'मैं ' अपना परिचय ना पा सकने के कारण नित नयी परेशानियो में फंसता उलझता चला गया । अनगिनत बिडंबनाये -बिभीषिकाए उसे संतृप्त करती चली गयी ।

इससे उबरना तभी संभव है जब 'मैं' अपनी खोजबीन करे । तनिक सोचे जिस काया को शरीर समझा जाता है, क्या यही मैं हूँ, क्या कष्ट, चोट, भूख, शीत - आतप आदि से पग-२ पर ब्याकुल होने वाला, अपनी सहायता के लिए बाजार, दरजी, किसान, रसोइया, चर्मकार, चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही 'मैं' हूँ ?